सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 10)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 अच्छा हमारे हजार कुण्ड वाले यज्ञ की बात आपको याद है आपने हमारे अनुष्ठान तो तो देखे नहीं है आप हमारे संग रहे नहीं है आप हमारे संग बैठे नहीं हैं। उसकी तो हम नहीं कह सकते लेकिन अभी भी लाखों आदमी जिंदा हैं जिन्होंने हमारा सन् ५८ का यज्ञ देखा है हजार कुण्डीय और जिसको देखकर लोग अचम्भे में पड़ गये थे कि जिस आदमी की जेब खाली हों दोनों जेब खाली हों जिस आदमी ने यह कसम खायी हो हमको किसी आदमी के सामने हाथ नहीं पसारना है और हमको किसी आदमी से यह नहीं कहना है कि हमें एक पैसे की जरूरत है लेकिन तो भी हमने इतना बड़ा आयोजन किया था आयोजन पूरा हुआ कि नहीं हुआ था न एक आदमी का एक्सीडेंट हुआ न एक आदमी की चोरी हुई न कोई बीमार पड़ा और न कोई घटना हुई सारी की सारी चीजों का उसमें पचासों लाख खर्चा हुआ था तो पूरा हो गया आपको नहीं याद है।

🔵  मैं आपको इसलिए कहता हूँ हमारी बातें हमारे जीवन का अनुभव इस लायक है कि आप हमको प्रामाणिक आदमी मान ले और यह मानकर चले कि कोई कहने वाला सामान्य आदमी नहीं है कोई बाजारू आदमी नहीं है कोई यार बाज़ आदमी नहीं है। निरर्थक आदमी नहीं है आवारागर्दी में घूमने वाला आदमी नहीं है। कोई वजनदार और भारी भरकम आदमी है और भारी भरकम आदमी ने भारी भरकम काम किया है उसके लिए जरूरत पड़ी है जरूरत नहीं भी पड़ती तो आपको नहीं भी कहता चलिये। लेकिन जरूरत पड़ी है। हजार कुण्ड का यज्ञ किया था तो हमको जरूरत पड़ी थी क्योंकि हजार कुण्डीय यज्ञ में एक एक कुण्ड में पाँच पाँच आदमी बिठाये गये और एक बार में ५ हजार आदमी बैठे और दस बार बैठाया तो पचास हजार आदमी बैठे ऐसे पाँच दिन तक यज्ञ चला उसमें कितने लाखों आदमी की जरूरत पड़ गयी।

🔴 जरूरत पड़ी इसलिये बुलाया जरूरत नहीं पड़ी होती तो हम नहीं भी बुलाते। अब हमने नये कदम उठाये हैं और उनको सुनकर के कोई आदमी भरोसा नहीं करेगा पर मैं आपसे कहता हूँ कि आप भरोसा कर लीजिये हमारा। कोई आदमी से हम कहेंगे कि हम एक लाख कुण्ड का यज्ञ करने वाले हैं यह बात आपकी समझ में आयेगी नहीं आपकी समझ में नहीं आयेगी। बड़े से बड़े यज्ञ कहीं हुये हैं अभी भोपाल में एक आदमी ने यज्ञ किया था इससे पहले एक सज्जन ने दिल्ली में किया था १००-१०० कुण्ड के थे बस और कोई बड़े यज्ञ थे बड़े यज्ञ नहीं थे हजार कुण्डीय यज्ञ किये थे उन्होंने हजार कुण्डीय तो हमने किये हैं बस और हमने अकेले एक मथुरा में नहीं किये थे फिर हमने हमारा कार्यक्षेत्र सात प्रान्तों में है जिनको हम हिन्दी भाषी प्रान्त कहते हैं उनमें कार्यक्षेत्र था तो सातों के सातों में उसी प्रकार के एक- एक हजार कुण्डीय यज्ञ किये थे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.4

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 Sowing and Reaping (Investment & its Returns) (Part 2)

🔵 Just begin to spend all you have of these two things to receive back 100 times of the same, number ONE. Number TWO, your mind is one ...