सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 37)

🌞 हिमालय में प्रवेश (जंगली सेब)

🔵 मैं भी साथ था। इस सब माजरे के आदि से अन्त तक साथ था। दूसरे और यात्री उन यात्रियों की भूल पर मुस्करा रहे थे; कनखियां ले रहे थे, आपस में उन फलों का नाम ले लेकर हंसी कर रहे थे। उन्हें हंसने का एक प्रसंग मिल गया था, दूसरों की भूल और असफलता पर आमतौर से लोगों को हंसी आती ही है। केवल पीला रंग और बढ़िया रूप देखकर उनमें पका मीठा और स्वादिष्ट फल होने की कल्पना करनी यह उनकी भूल थी। रूप से सुन्दर दीखने वाली सभी चीजें मधुर कहां होती हैं, यह उन्हें जानना चाहिए था। न जानने पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी और परेशानी भी हुई। आपस में लड़ाई झगड़ा होता रहा सो व्यर्थ ही।

🔴 सोचता हूं बेचारी इन स्त्रियों की ही हंसी हो रही है और सारा समाज रंग रूप पर मुग्ध होकर पतंगे की तरह जल रहा है, उस पर कोई नहीं हंसता। रूप की दुनिया में सौंदर्य का देवता पूजता है। तड़क-भड़क, चमक-दमक सबको अपनी ओर आकर्षित करती है और उस प्रलोभन से लोग बेकार चीजों पर लट्टू हो जाते हैं। अपनी राह खोटी करते हैं और अन्त में उनकी व्यर्थता पर इस तरह पछताते हैं जैसे यह स्त्रियां बिन्नी के कड़ुवे फलों को समेट कर पछता रही हैं। रूप पर मरने वाले यदि अपनी भूल समझें तो उन्हें गुणों का पारखी बनना चाहिये। पर यह तो तभी सम्भव है जब रूप के आकर्षण से अपनी विवेक बुद्धि को नष्ट होने से बचा सकें।

🔵 बिन्नी के फल किसी ने नहीं खाये। वे फेंकने पड़े। खाने योग्य वे थे भी नहीं। धन, दौलत, रूप, यौवन, राग-रंग, विषय-वासना, मौज-मजा जैसी अगणित चीजें ऐसी हैं जिन्हें देखते ही मन मचलता है किन्तु दुनिया में चमकीली दीखने वाली चीजों में से अधिकांश ऐसी ही होती हैं जिन्हें पाकर पछताना और अन्त में उन्हें आज के जाली सेबों की तरह फेंकना ही पड़ता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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