सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 3)

🌹 युगधर्म का परिपालन अनिवार्य

🔵 समय पीछे नहीं लौटता, वह निरन्तर आगे ही बढ़ता है। उसके बाद ही मान्यताओं में, प्रचलनों में भी परिवर्तन होता चलता है। ऐसा आग्रह कोई कदाचित् ही करता हो, कि जो पहले दिनों माना या किया जाता रहा है, वही पत्थर की तरह सदा सर्वदा जारी रहना चाहिये। ऐसे दुराग्रही तो शायद बिजली का प्रयोग करने और नल का पानी पीने से भी ऐतराज कर सकते हैं? उन्हें शायद गुफा बनाकर रहने का भी आग्रह हो, क्योंकि पूर्व पुरुषों ने निवास के लिए उसी प्रक्रिया को सरल समझा था।

🔴 कभी मिट्टी के खपरों पर लेखन का काम लिया जाता था। बाद में चमड़े, भोजपत्र, ताड़पत्र आदि पर लेखन कार्य चलने लगा। कुछ दिनों हाथ का बना कागज भी चला, पर अब तो सर्वत्र मिलों का बना कागज ही काम में आता है। हाथ से ग्रन्थों की नकल करने का उपक्रम लम्बे समय तक चलता रहा है, पर अब तो छपाई की सरल और सस्ती सुविधायें छोड़ने के लिये कोई तैयार नहीं। तब रेल मोटर आदि की आवश्यकता न थी, पर अब तो उनके बिना परिवहन और यातायात का काम नहीं चलता। डाक से पत्र व्यवहार करने की अपेक्षा घोड़ों पर लम्बी दूरी पर सन्देश भेजने की प्रथा अब एक प्रकार से समाप्त ही हो गयी है।

🔵 परिवर्तन के साथ जुड़े हुये नये आयाम विकसित करने की आवश्यकता अब इतनी अनिवार्य हो गई है कि उसे अपनाने से कदाचित् ही कोई इन्कार करता हो? घड़ी का उपयोग करने से अब कदाचित् ही कहीं एतराज किया जाता हो? समय हर किसी को बाधित करता है कि युग धर्म पहचाना जाये और उसे अपनाने में आनाकानी न की जाये। नीति-निष्ठा एवं समाज-निष्ठा के सम्बन्ध में शाश्वत हो सकता है, पर रीति रिवाजों, क्रिया-कलापों उपकरणों आदि प्रचलित नियम अनुशासन के सम्बन्ध में पुरातन परिपाटी के भक्त तो कहे जा सकते हैं, पर अपने अतिरिक्त और किसी को इसके लिए सहमत नहीं कर सकते कि लकीर के फकीर बने रहने में ही धर्म का पालन सन्निहित है। जो पुरातन काल में चलता रहा है, उसमें हेर-फेर करने की बात किसी को सोचनी ही नहीं चाहिए, ऐसा करने को अधर्म कहा जायेगा और उसे करने वाले पर पाप चढ़ेगा।

🔴 किसी भी भली-बुरी प्रथा को अपनी और पूर्वजों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर उस पर अड़ा और डटा तो रहा जा सकता है, पर उसमें बुद्धिमानी का समावेश तनिक भी नहीं है। मनुष्य प्रगतिशील रहा है और रहेगा। वह सृष्टि के आदि से लेकर अनेक परिवर्तनों के बीच से गुजरता हुआ आज की स्थिति तक पहुँचा है। यह क्रम आगे भी चलता ही रहने वाला है। पुरातन के लिए हठवादी बने रहना किसी भी प्रकार किसी के लिए भी हितकारी नहीं हो सकता । युग धर्म को अपनाकर ही मनुष्य आगे बढ़ा है और भी उसके लिए तैयार रहेगा। समय का यह ऐसा तकाजा है, जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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