सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 96)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (7) सुधार प्रतिरोध और असहयोग— जहां विवाहों में अपव्यय करने का पागलपन गहराई तक जड़ जमाये बैठा हो, वहां यह आशा नहीं की जा सकती कि प्रचार से ही सब कुछ ठीक हो जायगा। इसके लिए उस किसान या माली से प्रेरणा लेनी पड़ेगी जो अवांछनीय झाड़-झंखाड़ों को उखाड़ फेंकने के लिए उनकी जड़ों पर अपने पैने औजारों के तीव्र प्रहार करता है। कूड़ा-करकट अपने आप नहीं हटता उसे झाड़ू से घसीट कर बाहर करना होता है। कुरीतियां अपने आप मिटने वाली नहीं हैं उनके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ेगा। उस संघर्ष में अपने को कुछ चोट पहुंचती हो तो उसे धर्म वीरों की परम्परा के अनुसार त्याग बलिदान का छोटा-सा सौभाग्य मानने के लिए तैयार रहना चाहिए।

🔵 हम में से जिनका प्रभाव जहां हो, वहां उस प्रभाव का उपयोग करके इन कुरीतियों से बचने का प्रयत्न करना चाहिए। अपने घर, कुटुम्ब, मित्र एवं रिश्तेदारों में तो ऐसा सुझाव बलपूर्वक भी किया जा सकता है और यदि वे न मानें तो अपने असहयोग की, उस विवाह में सम्मिलित न होने की बात भी कही जा सकती है।

🔴 जिन विवाहों में अपने को सम्मिलित होने का अवसर मिले उनमें पूर्णतया न सही, जितना कुछ वश चले, 24 में से जितने भी सूत्र जितने अंशों में भी कार्यान्वित किये जा सकें उसके लिए जोर देना चाहिये, प्रयत्न करना चाहिये। जो अन्य प्रभावशाली व्यक्ति उस उत्सव में आते हों उनमें से कोई विचारवान दीखें तो उनके माध्यम से प्रभाव डलवाना चाहिये ताकि जितने अंशों में कुरीतियां हट सकें उतना तो किया ही जाय। आदर्श विवाह आन्दोलन के सम्बन्ध में छपे ट्रैक्ट भी ऐसे अवसरों पर रखने चाहिये और उन्हें पढ़ा सुनाकर ऐसा वातावरण बनाना चाहिये कि सुधारवादी विचारधारा के लिए कोई स्थान उनके मन में बने। यह सब काम बिना कटु संघर्ष के चतुरता एवं बुद्धिमत्ता द्वारा मधुरता के वातावरण में भी सम्पन्न हो सकते हैं।

🔵 असहयोग वहीं करना चाहिए जहां अपना दबाव हो। अन्य विवाहों में सम्मिलित होकर अपनी विचारधारा के पक्ष में जितना भी वातावरण बन सके उतना बनाना चाहिये। रूठ बैठना या ऐसे पुराने ढर्रे से जहां विवाह हो रहा हो वहां जाना ही नहीं इस प्रकार का असहयोग व्यर्थ है। वहां तो भीतर घुस कर ही कुछ काम हो सकता है।

🔴 यों कानून द्वारा भी दहेज, अधिक बारात ले जाने पर कड़े प्रतिबन्ध लगे हुए हैं, पर उनका प्रयोग न करे जहां तक सम्भव हो सके प्रेम, मधुरता, प्रचार, समझाना, धमकी, नाराजी आदि शस्त्रों से ही काम लेना चाहिये। जहां अनिवार्य हो जाय वहीं कानूनी सहायता ली जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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