सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

👉 संकल्पवान्-व्रतशील बनें (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 आपका दुश्मन नम्बर एक-आपका मन और आपका दोस्त नम्बर एक-आपका मन। दुश्मन को दोस्त के रूप में बदलने के लिये जिस दबाव की जरूरत है, जिस आग की भट्ठी में नया औजार ढालने की जरूरत है, उस भट्ठी का नाम है-संकल्प, आत्मानुशासन। अपने आपका आत्मानुशासन स्थापित करने के लिये आपको व्रतशील होना चाहिए, संकल्पवान् होना चाहिए और संकल्पों में व्यवधान उत्पन्न न हो, इसलिये आपको कोई न कोई ऐसे नियम और व्रत समय-समय पर लेते रहना चाहिए। इसका अर्थ ये होता है कि जब तक अमुक काम न हो जायेगा, तब तक हम अमुक काम नहीं करेंगे।

🔵 संकल्पवान् बनिए। संकल्पवान् ही महापुरुष बने हैं, संकल्पवान् ही उन्नतिशील बने हैं, संकल्पवान् ही सफल हुए हैं और संकल्पवानों ने ही संसार की नाव को पार लगाया है। आपको संकल्पवान् और व्रतशील होना चाहिए। नेकी आपकी नीति होनी चाहिए। उदारता आपका फर्ज होना चाहिए। आपने अगर ऐसा कर लिया हो तब फिर आप दूसरा कदम ये उठाना कि हम ये काम नहीं किया करेंगे।

🔴 समय-समय पर सोच लिया कीजिए कि गुरुवार के दिन, नमक न खाने की बात, ब्रह्मचर्य से रहने की बात, दो घण्टे मौन रहने की बात, आप भी ऐसे व्रतशील होकर के कुछ नियम पालन करते रहेंगे और उसके साथ में किसी श्रेष्ठ कर्तव्य और उत्तरदायित्व का ताना-बाना जोड़ के रखा करेंगे तो आपके विचार सफल होंगे, आपका व्यक्तित्व पैना होगा और आपकी प्रतिभा तीव्र होगी और आप एक अच्छे व्यक्ति के रूप में शुमार होंगे। अगर आप आत्मानुशासन और अपनी व्रतशीलता का महत्त्व समझें और उसे अपनाने की हिम्मत बढ़ायें।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

🔴 कुछ नई स्कीम है, जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, लेकिन जग...