शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 101)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 4. कार्य का आरम्भ:-- यह प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन-कार्य अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों द्वारा आरम्भ किया जा रहा है। इसलिए प्रेरक सदस्यों की तरह आरंभ में वे ही अपनी-अपनी उपजाति का क्षेत्रीय संगठन बना लें। क्षेत्र की परिधि साधारणतया 50-50 मील चारों ओर होनी चाहिए। सौ मील लम्बे और सौ मील चौड़े क्षेत्र में भी सैकड़ों गांव कस्बे होते हैं, उतने क्षेत्र को ठीक तरह संगठित कर सकना भी कठिन नहीं है। इसलिए आरम्भ में भले ही यह क्षेत्र अधिक विस्तृत हों, पर अन्त में इनका कार्य-क्षेत्र उतना ही बड़ा रहना चाहिए, जितने में कि कार्यकर्त्ता गण आसानी से आपस में मिलते-जुलते रह सकें। इस दृष्टि से सौ-सौ मील की लम्बाई-चौड़ाई का क्षेत्र पर्याप्त है। विशेष परिस्थिति होने पर ही उसे घटाया-बढ़ाया जाय।

🔵 अखण्ड-ज्योति सदस्यों के यह उपजातियों के आधार पर क्षेत्रीय संगठन तुरन्त बन जाने चाहिए। इसके लिए कुछ अधिक सेवा-भावी व्यक्तियों को आगे आना चाहिए और इन सब सदस्यों से मिलकर उन्हें मीटिंग के लिए आमन्त्रित करना चाहिए। सब लोग इकट्ठे होकर अपनी-अपनी सदस्यता को नियमित कर लें। दस व्यक्तियों की कार्य-समिति गठित करलें और प्रधान-मन्त्री तथा कोषाध्यक्ष चुन लें। युग-निर्माण केन्द्रों में पांच व्यक्तियों की कार्य-समिति होती है और एक शाखा संचालक ही पदाधिकारी रहता है, पर इन जातीय संगठनों में उपरोक्त तीन पदाधिकारी और 10 सदस्य रहने चाहिए, क्योंकि इनका कार्य-क्षेत्र बड़ा है।

🔴 5. क्षेत्रीय संगठनों का विस्तार:-- यह प्रारम्भिक गठन हो जाने के बाद इन प्रेरक सदस्यों को अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में सदस्य बनाने के लिए छोटी-छोटी मित्र-मण्डलियों के रूप में नये सदस्य भर्ती करने निकल पड़ना चाहिए। जिन गांवों में कम से कम पांच सदस्य भी बन जांय, वहां ग्राम सभाएं बना दी जांय। प्रयत्न यह होना चाहिए कि जहां भी जिस उपजाति के लोग हों, उनकी एक-एक ग्राम-सभा वहां गठित रहे। क्षेत्रीय सभाओं के अन्तर्गत जितनी ग्राम सभाएं होंगी, वह उतनी ही सफल मानी जायेंगी और उनकी गतिविधियां उतनी ही बढ़ सकेंगी। इसलिए क्षेत्रीय संगठनों के कार्यकर्त्ताओं को दौरा करके अपना कार्य-क्षेत्र सुगठित कर लेने के लिए तत्परतापूर्वक लग जाना ही पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/02/100-11-feb.html

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