शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 49)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 मनुष्य की यह एक अद्भुत विशेषता है कि वह जिन परिस्थितियों में रहने लगता है उनका अभ्यस्त भी हो जाता है। जब मैंने इस निर्जन वन की सुनसान कुटियों में प्रवेश किया तो सब ओर सूना ही सूना लगता था। अन्तर का सूनापन जब बाहर निकल पड़ता तो सर्वत्र सुनसान ही दीखता था। पर अब जबकि अन्तर की लघुता धीरे-धीरे विस्तृत होती जा रही है, चारों ओर अपने ही अपने हंसते-बोलते नजर आते हैं। अब सूनापन कहां? अब अन्धेरे में डर किसका?

🔴 अमावस्या की अंधेरी रात, बादल घिरे हुए, छोटी-छोटी बूंदें, ठण्डी वायु का कम्बल को पार कर भीतर घुसने का प्रयत्न। छोटी-सी कुटिया में पत्तों की चटाई पर पड़ा हुआ यह शरीर आज फिर असुखकर अनभ्यस्तता अनुभव करने लगा। नींद आज फिर उचट गई। विचारों का प्रवाह फिर चल पड़ा। स्वजन सहचरों से भरे सुविधाओं से सम्पन्न घर और इस सघनतामिस्र की चादर लपेटे वायु के झोकों से थर-थर कांपती हुई जल से भीग कर टपकती पर्ण कुटी की तुलना होने लगी। दोनों के गुण-दोष गिने जाने लगे।

🔵 शरीर असुविधा अनुभव कर रहा था। मन भी उसी का सहचर ठहरा। वही क्यों इस असुविधा में प्रसन्न होता? दोनों की मिली भगत जो है। आत्मा के विरुद्ध ये दोनों एक हो जाते हैं। मस्तिष्क तो इनका खरीदा हुआ वकील है। जिसमें इनकी रुचि होती है उसी का समर्थन करते रहना इसने अपना व्यवसाय बनाया हुआ है। राजा के दरबारी जिस प्रकार हवा का रुख देखकर बात करने की कला में निपुण होते थे, राजा को प्रसन्न रखने, उसकी हां में हां मिलाने में दक्षता प्राप्त किये रहते थे, वैसा ही यह मस्तिष्क भी है। मन की रुचि देखकर उसी के अनुकूल यह विचार प्रवाह को छोड़ देता है। समर्थन में अगणित कारण हेतु, प्रयोजन और प्रमाण उपस्थित कर देना इसके बायें हाथ का खेल है। सुविधाजनक घर के गुण और इस कष्टकारक निर्जन के दोष बताने में वह बैरिस्टरों के कान काटने लगा। सनसनाती हुई हवा की तरह उसका अभिभाषण भी जोरों से चल रहा था।

🔴 इतने में सिरहाने की ओर छोटे से छेद में बैठे हुए झींगुर ने अपना मधुर संगीत गान आरम्भ कर दिया। एक से प्रोत्साहन पाकर दूसरा बोला। दूसरे की आवाज सुनकर तीसरा, फिर उससे चौथा, इस प्रकार उसी कुटी में अपने-अपने छेदों में बैठे कितने ही झींगुर एक साथ गाने लगे। उनका गायन यों उपेक्षा बुद्धि से तो अनेकों बार सुना था। उसे कर्कश, व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण समझा था, पर आज मन के लिए कुछ और काम न था। वह ध्यान पूर्वक इस गायन के उतार, चढ़ावों को परखने लगा। निर्जन की निन्दा करते-करते वह थक भी गया था। इस चंचल बन्दर को हर घड़ी नये-नये प्रकार के काम जो चाहिए। झींगुर की गान-सभा का समा बंधा तो उसी में रस लेने लगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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