शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

👉 संकल्प तोड़ना ठीक बात नहीं

 🔴 कांग्रेस के इतिहास में शोलापुर कांड लगभग जलियाँ वाला कांड जैसा ही था। वहाँ मार्शल ला लगा दिया गया था। देश भर से वालंटियर वहाँ जाते थे और गोलियां की बौछार द्वारा चने की तरह भून दिये जाते थे।

🔵 लालबहादुर शास्त्री ने भी अपना नाम वालंटियरों में भेज दिया। यह खबर टंडन जी को लगी तो उन्हें शास्त्रीजी के जीवनरक्षा की चिंता हुई। उन्होंने शास्त्रीजी की माता जी को खबर भेजी किसी तरह शास्त्रीजी को वहाँ जाने से तुम्हीं रोको वह और किसी की बात मानने वाले नहीं।''

🔴 भारतीय माताओं का वात्सल्य और मोह अन्यतम कहा जा सक्ता है। विशेषकर ऐसी स्थिति में जबकि जीवन-मरण की समस्या प्रस्तुत हुई हो उनका मोह उग्र होना स्वाभाविक ही कहा जा सकता है, वे हर संभव प्रयास करती हैं कि बच्चा रूक जाए, अमुक कार्य न करे, जिससे कोई हानि हो या जीवन को खतरा उत्पत्र हो।

🔵 शास्त्री जी की माता जी ग्रामीण जीवन में पली थीं। यह आशा थी कि वे इस समाचार से व्याकुल हो उठेंगी और शास्त्रीजी को शोलापुर न जाने देंगी।

🔴 पर हुआ कुछ दूसरा ही। जैसे ही उनके पास यह खबर पहुँची, वह रोष में भरकर बोलीं- मेरे बच्चे ने जो संकल्प लिया है उसे पूरा करना ही चाहिए। मैं उसे रोक नहीं सकती। बच्चे का शहीद होना सौभाग्य मानूँगी, पर उसे कर्तव्य से गिरते सहन नहीं कर सकती। प्रतिज्ञाऐं किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों की पूर्ति के लिये की जाती हैं, उन्हें निभाना मनुष्य का परम धर्म है। जो उसकी अवहेलना करता है उसकी आत्मा कमजार होती है। मेरा बच्चा कमजोर आत्मा वाला कायर और कर्तव्यद्युत कहलाए, यह हमारी शान के प्रतिकूल है। मैं उसे सहर्ष शोलापुर जाने की आज्ञा देती हूँ।

🔵 धर्म और आदर्शों की रक्षा ऐसी ही माताओं से होती है, जो बेटे के स्थूल शरीर की अपेक्षा उसके गुणों से मुहब्बत रखती हैं, जिन्हें चाम प्यारा नहीं होता, आत्माभिमान प्यारा होता है। माता जी की इस दृढ मनस्विता को ही श्रेय दिया जा सकता है, जो सामान्य परिस्थितियों से बढकर शास्त्री जी भारतीय इतिहास आकाश में उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमके। कर्तव्यपालन की अडिगता धैर्य, निर्भीकता और संकल्प-ज्ञयता के भाव उनकी माता जी के ही देन थे।

🔴 यह आदर्श हर भारतीय माता का आदर्श होना चाहिए। बच्चों के आत्म-विकास में चरित्र और गुणों का स्थान सर्वोपरि है, यदि बच्चे को ऐसी किसी कसौटी से गुजरना पडे़ तो माताओं को उनके गुण-गौरव को ही प्रोत्साहन देना चाहिए, भले ही भौतिक दृष्टि से हानि ही क्यों न हो?

🔵 शास्त्रीजी रोक दिये गये होते तो उनकी आत्मा आत्महीनता और प्रायश्चित के बोझ से दब गई होती। दबी हुई आत्माएँ तो सच्ची और न्याय की बात भी स्पष्ट नहीं कह पाती देश और समाज को राह दिखाना उन बेचारों के बूते कहाँ? जो प्रतिज्ञाएँ करते है और मरकर भी उन्हें पूरा करने का प्रयत्न करते है, एसे दृढ स्वभाव के व्यक्ति आगे चलकर कुछ बडे काम कर पाते है।

🔴 शास्त्रीजी शोलापुर गये। उन्होंने मृत्यु की परवाह नहीं की। जेल चले गए यातनाएँ सहीं, पर उन्होंने की हुई प्रतिज्ञाओं से कभी पीछे कदम न हटाया। कर्तव्यपालन की इस दृढता ने एक छोटे-से आदमी को बडा बना दिया। साधारण ग्रामीण को अंतराष्ट्रीय ख्याति का प्रधानमंत्री बना दिया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 23, 24

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