शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

👉 सामाजिक क्रान्ति (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 धर्मतंत्र का तीसरा कार्य जो करने का है, जिससे कि मनुष्य की अन्तःचेतना विकसित होती हो, वो है ‘सामाजिक क्रान्ति’। समाज की छुट-पुट बुराइयाँ जो सामने दिखाई पड़ती हैं, इनको दूर करने के लिये विरोध और आंदोलन करने की तो जरूरत है ही, लेकिन श्रेष्ठ समाज बनाने के लिये जिन रचनात्मक वस्तुओं को जीवन में धारण करने की जरूरत है, वो उच्चस्तरीय सिद्धान्त हैं, जो व्यक्ति को समाजपरक बनाते हैं। ‘‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’’ की मान्यता जन-जन के अन्तःकरण में जगायी जानी चाहिए। हरेक के मन में ये विश्वास होना चाहिये कि जो हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं, वही हमें दूसरों के साथ में व्यवहार करना चाहिए। सामाजिक क्रान्ति के लिये ये सिद्धान्त आवश्यक है कि हर आदमी के मन में गहराई तक प्रवेश कर जाए।

🔵 हममें से हर आदमी के मन में एक विचार उत्पन्न किया जाना चाहिये कि ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ ‘सारा विश्व ही हमारा कुटुम्ब है’। दो-पाँच आदमी नहीं, बल्कि यह सारी वसुधा ही हमारा कुटुम्ब है और जिस तरीके से अपने घर का और बाल-बच्चों का हम ध्यान रखते हैं, उसी तरीके से समस्त विश्व में सुख और शान्ति के लिये ध्यान रखना और प्रयत्न करना आवश्यक है। सामाजिक क्रान्ति के लिये उन आध्यात्मिक सिद्धान्तों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए, जिसमें कि महत्त्वपूर्ण ऐसे सिद्धान्त बने हुए हैं, जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तिवाद के ऊपर अंकुश करके समाजपरक बनता चला जाये।

🔴 ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् नः समाचरेत्’ का सिद्धान्त अगर हम अपने जीवन में धारण कर लें तो हमारे सामाजिक जीवन में श्रेष्ठता का आ जाना स्वाभाविक है। मिल-बाँट कर खाने की वृत्ति अगर हमारे भीतर हो तो जो आज हम सबके पास है, उसी से सबका गुजारा बड़े मजे से हो सकता है। हम उदारता से उपार्जन करें। उपार्जन का उपयोग करना सीखें, उपभोग नहीं।
 
🔵 समता हमारे जीवन का अंग रहनी चाहिए। सर्व समाजों में समता। जिसमें नर-नारी की समता और आर्थिक समता का भी ऊँचा स्थान होना चाहिये। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनना चाहिये और सहकारिता के सिद्धान्तों को अपनाकर पारिवारिक जीवन में और सामाजिक जीवन में हर काम की व्यवस्था बनानी चाहिए। अनीति और अन्याय जहाँ कहीं भी दिखाई पड़े, उससे लड़ने के लिये हमको जटायु जैसा साहस एकत्रित करना चाहिए।   

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/samajik_karnti

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