बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

👉 पूजा-उपासना के मर्म (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मेरी उपासना का क्रम पूजा-उपासना तक सीमित नहीं है। 24 घण्टे मैंने उपासना की है, 24 घण्टे अपने आपको परिशोधन और संशोधन करने के लिये आग में तपाया है। मैंने हर बार अपनी मनोवृत्तियों की परख की है और मैंने हर बार मन की सफाई की है। इस लायक अपने मन को बनाया है कि अगर भगवान् अपने भीतर आये तो नाखुश होकर के नहीं चला जाये, परेशान होकर के नहीं चला जाये। यहाँ से नफरत लेकर के नहीं चला जाये। मन की सफाई करने की जरूरत है।

🔵 भगवान् को आदमी की मक्कारियों और आदमी की लिप्साओं से बहुत नफरत है। भगवान् खुशामद से मानने वाले नहीं हैं। भगवान् को नाम के अक्षर के उच्चारण करने की जरूरत नहीं है। भगवान् की औकात और भगवान् ऐसे नहीं हैं कि आप उसकी तारीफ करें, खुशामद करें, बार-बार नाम लें, बार-बार उसके गुणों को गायें, उसके बाद में उसको अपने काबू में कर लें, कब्जे में कर लें। इतना कमजोर दिल, इतना कमजोर प्रकृति का भगवान् नहीं हो सकता। हम इन्सान उनको इतना कमजोर समझते हैं कि कोई आदमी खुशामद करके जो कुछ चाहे, चाहे जब उनसे वसूल कर ले जाये वह भगवान् कैसे हो सकता है?

🔴 जो व्यक्ति खुशामद करें, तारीफ करें, जो कुछ भी चाहें, वही हमको मिल जाये। ये मुमकिन है? ये नामुमकिन है। भगवान् तुम बड़े अच्छे हो, तुम्हारी नाक बड़ी अच्छी है, तुमने महिषासुर को मार डाला, तुमने फलाने को मार डाला, तुमने कंस को मार डाला, तुमने वृत्रासुर को मार डाला, अब लाओ। उल्लू कहीं का। आज इसी का नाम पूजा, इसी का नाम उपासना, इसी का नाम ध्यान, इसी का नाम जप।

🔵 सारा विश्व अज्ञान के अंधकार में डूबा हुआ; भ्रम के जंजाल में फँसता हुआ और अपना वक्त और अपना समय बरबाद करता हुआ; अध्यात्म को बदनाम करता चला जाता है और शिकायत करता हुआ चला जाता है कि हमने भगवान् का नाम लिया था, पूजा की थी, खुशामद की थी, मिठाई खिलायी थी, चावल खिलाया था, धूपबत्ती खिलायी थी, आरती जलायी थी, और हमें कोई फायदा नहीं हुआ, कैसे हो सकता है फायदा?  फायदा होना चाहिए। उसका लाभ उठाने के लिये आदमी को अपने जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश करना होगा। जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश है-पूजा-उपासना का शिक्षण।  

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/pooja_upasna_ke_marn

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