बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 60)

🌹 लक्षपूर्ति की प्रतीक्षा

🔵 शिला की आत्मा बिना रुके कहती ही रही। उसने आत्म विश्वास पूर्वक कहा—मुझे देख। मैं भी अपनी हस्ती को उस बड़ी हस्ती में मिला देने के लिए यहां पड़ी हूं। अपने इस स्थूल शरीर को—विशाल शिला खण्ड को—सूक्ष्म, अणु बना कर उस महासागर में मिला देने की साधना कर रही हूं। जल की प्रत्येक लहर से टकरा कर मेरे शरीर के कुछ कण टूटते हैं और वे रज कण बनकर समुद्र की ओर बह जाते हैं। इस तरह मिलन की बूंद-बूंद स्वाद ले रही हूं, तिल-तिल अपने को घिस रही हूं। इस प्रकार प्रेमी के प्रति आत्मदान का आनन्द कितने अधिक दिन तक लेने का रस ले रही हूं। यदि उतावले अन्य पत्थरों की तरह बीच जलधारा में पड़कर लुढ़कने लगती तो सम्भवतः कब की में लक्ष तक पहुंच जाती। फिर यह तिल-तिल अपने को प्रेमी के लिये घिसने का जो आनन्द है उससे तो वंचित ही रह गई होती?’’

🔴 ‘‘उतावली न कर, उतावली में जलन है, खोज है, निराशा है, अस्थिरता है, निष्ठा की कमी है, क्षुद्रता है। इन दुर्गुणों के रहते कौन महान् बना है? और कौन लक्ष तक पहुंचा है? साधक का पहला लक्षण है—धैर्य! धैर्य की परीक्षा ही भक्ति की परीक्षा है। जो अधीर हो गया सो असफल हुआ। लोभ और भय के, निराशा और आवेश के—जो अवसर साधक के सामने आते हैं उनमें और कुछ नहीं, केवल धैर्य परखा जाता है। तू कैसा साधक है जो अभी इस पहले पाठ को भी नहीं पढ़ पाया?’’

🔵 शिला की आत्मा ने बोलना बन्द कर दिया। मेरी तंद्रा टूटी। इस उपालम्भ ने अन्तःकरण को झकझोर डाला ‘‘पहला पाठ भी अभी नहीं पढ़ा, और लगा है बड़ा साधक बनने।’’ लज्जा और संकोच से सिर नीचा हो गया अपने को समझाता और धिक्कारता रहा। शिर ऊपर उठाया तो देखा, ऊषा की लाली उदय हो रही है। उठा और नित्य कर्म की तैयारी करने लगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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