बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

👉 सत्य मेरा जीवन-मंत्र

🔴 दादा मावलंकर जिस अदालत के वकील थे उसका मजिस्ट्रेट उनका कोई घनिष्ठ मित्र था। यों वकालत के क्षेत्र में उन्हें पर्याप्त यश और सम्मान भी बहुत मिला था। संपत्ति भी उनके पास थी, पर यह सब कुछ उनके लिये तब तक था, जब तक उनके सांच को आँच न आने पाती थी। वे कोई झूठा मुकदमा नहीं लेते थे और सच्चाई के पक्ष में कोई भी प्रयत्न छोड़ते नहीं थे।

🔵 यह उदाहरण उन सबके लिए आदर्श है जो यह कहते हैं कि आज का युग ही ऐसा है झूठ न बोलो, मिलावट न करो तो काम नहीं चलता। सही बात तो यह है कि झूठे, चापसूस और अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले के जीवन सदैव टकराते रहते है।

🔴 विषाद, क्षोभ, ग्लानि, अपमान, अशांति और पश्चाताप की परिस्थितियाँ बनावटी लोगों के पास ही आती हैं। सच्चे व्यक्तियों के जीवन में बहुत थोडी अशांति, अव्यवस्था और तंगी रहती है। अधिकांश तो शान और स्वाभिमान का ही जीवन जीते है।

🔵 वैसे ही मावलंकर जी भी थे। एक बार उनके पास बेदखली के लगभग ४० मुकदमे आए। मुकमे लेकर पहुँचने वाले लोग जानते थे कि कलक्टर साहब मावलंकर जी के मित्र है। इसलिये सुनिश्चित जीत की आशा से वे भारी रकम चुकाने को तैयार थे। मावलंकर चाहते तो वैसा कर भी सकते थे, किंतु उन्होंने पैसे का रत्तीभर भी लोभ न कर सच्चाई और मनुष्यता का ही बडप्पन रखा।

🔴 सभी दावेदारों को बुलाकर उन्होंने पूछा देखो भाई आज तो आप लोगों ने सब कुछ देखसमझ लिया। आप लोग घर जाओ। कल जिनके मुकदमे सही हों वही मेरे पास आ जाना।

🔵 दूसरे दिन कुल एक व्यक्ति पहुँचा। मावलंकर जी ने उस एक मुकदमे को लिया और ध्यान देकर उसकी ही पैरवी की। वह व्यक्ति विजयी भी हुआ। शेष ने बहुत दबाव डलवाया पर उन्होंने वह मुकदमे छुए तक नहीं।

🔴 आप जानते होंगे कि गाँधी जी भी प्रारंभ में बैरिस्टर थे। उनका जीवनमंत्र था- "सच्चाई का समर्थन और उसके लिए लड़ना।" झूठ और छल से जिस तरह औरों को घृणा होती है, उन्हें भी घृणा थी पर ऐसी नहीं कि स्वार्थ का समय आए तो उनकी निष्ठा डिग जाए। सत्य वही है जो जीवन में उतरे तो अपने पराये, हानि-लाभ, मान-अपमान का ध्यान किये बिना निरंतर सखा और मित्र बना रहे।

🔵 जब गांधी जी अफ्रीका मे थे तब उन्हें एक मुकदमा मिला। लाखों की संपत्ति का मुकदमा था। मुकदमा चलाने वाला पक्ष जीत गया। गांधी जी के काफी बडी रकम फीस में मिली।

🔴 इस बीच गाँधी जी को पता चल गया कि मुकदमा झूठा था तब वे एक बडे वकील के साथ मुकदमा करते थे। उन्होंने जाकर कहा- मुकदमा गलत हो गया है। सच्चे पक्ष को हम लोगों ने बुद्धि-चातुर्य से हराया, यह मुझे अच्छा नहीं लगता न यह मानवता के सिद्धंतों के अनुरूप ही है। जिसकी संपत्ति है उसी के मिले, दूसरा अनधिकार चेष्टा क्यों करे ''

🔵 वकील बहुत गुस्सा हुआ और बोला यह वकालत है महाशय इसमें सच्चाई नहीं चलती। सच्चाई ढूँढो़गे तो भूखों मरोगे।"

🔴 गाँधी जी न अपनी बात से डिगे न भूखे मरने की नौबत आई। उनकी निष्ठ ने उन्हें उपर ही उठाया। सारी दुनिया का नेता बना दिया। उन्होंने वह मुकदमा फिर अदालत में पेश कर दिया। सारी बात जज को समझायी। जज ने मामला पलट दिया और अंत में सत्य पक्ष की ही जीत हुई। आर्थिक लाभ भले ही न हुआ हो पर उससे उनकी प्रतिष्ठा को आँच न आई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 42, 43

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