बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 18)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 बहुत बार देखने में आता है कि डॉक्टर रोगी के घर जाता है, और उसे खूब अच्छी तरह देख-भाल कर चला जाता है। कोई दवा नहीं देता। तब भी रोगी अपने को दिन भर भला-चंगा अनुभव करता रहता है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण यही होता है कि वह बुद्धिमान डॉक्टर अपने साथ रोगी के लिए अनुकूल वातावरण लाता है और अपनी गतिविधि से ऐसा विश्वास छोड़ जाता है कि रोगी की दशा ठीक है, दवा देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। इससे रोगी तथा रोगी के अभिभावकों का यह विचार दृढ़ हो जाता है कि रोग ठीक हो रहा है। विचारों का अनुकूल प्रभाव जीवन तत्व को प्रोत्साहित करता है और बीमार की तकलीफ कम हो जाती है।

🔵 कुछ समय पूर्व कुछ वैज्ञानिकों ने इस सत्य का पता लगाने के लिए कि क्या मनुष्य के शरीर पर आन्तरिक भावनाओं का कोई प्रभाव पड़ता है, एक परीक्षण किया। उन्होंने विभिन्न प्रवृत्ति के आदमियों को एक कोठरी में बन्द कर दिया। उसमें से कोई क्रोधी, कोई विषयी और कोई नशों का व्यसनी था। थोड़ी देर बाद गर्मी के कारण उन सबको पसीना आ गया। उनके पसीने की बूंदें लेकर अलग-अलग विश्लेषण किया गया और वैज्ञानिकों ने उसके पसीने में मिले रासायनिक तत्वों के आधार पर उसके स्वभाव घोषित कर दिये जो बिल्कुल ठीक थे।

🔴 मानसिक दशाओं अथवा विचार-धाराओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता है, इसका एक उदाहरण बड़ा ही शिक्षा-प्रद है— एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो गया। पांच मिनट बाद उसने उसी आवेश की अवस्था मैंने अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर ही बच्चे की हालात खराब हो गई और उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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