सोमवार, 8 मई 2017

👉 गुरु नानक की सज्जनोचित उदारता

🔵 सिक्ख संप्रदाय के आदि गुरु- गुरु नानक प्रारंभ से ही बडे उदार और दयावान् थे। किसी को कष्ट देना तो वे जानते ही न थे। संतों की सेवा और उनके सत्संग में उन्हें बडा आनंद आता था। जब कभी भी उन्हें इसका अवसर मिलता था तो उसका लाभ अवश्य उठाते थे। उनके इन्हीं गुणों ने उन्हें एक उच्च कोटि का महात्मा बना दिया। उन्होंने अपना सारा जीवन लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने मे लगा दिया।

🔴 एक अच्छे ज्ञानी और संत होने पर भी गुरु नानक ने अपने आवश्यक कर्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोडा। उन्हें जो भी काम दिया जाता था उसे करने में कभी संकोच नहीं करते थे। एक बार उनके पिता ने उन्हें खेती का काम करने के लिए नियुक्त किया। गुरु नानक ने उसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने हाथ से खेती का सारा काम करके बडी अच्छी फसल तैयार की। पकने तक फसल की रखवाली करने का काम भी उन्हें सौंपा गया और वे फसल की रखवाली भी करने लगे।

🔵 एक बार कुछ गाएँ आकर फसल खाने लगीं नानक ने उन्हें डाँटा, फटकारा और ललकारा लेकिन गायों ने एक न सुनी और वे सारा खेत खा गई। पिता को पता चला तो वे नानक से बडे नाराज हुए-बोले "तूनै गायों को भगाया क्यों नहीं" नानक ने कहा-"मैंने तो उन्हें बहुत मना किया, डाँटा-ललकारा भी, लेकिन वे इतनी भूखी थीं कि मानी ही नहीं।" पिता ने और डाँटा और कहा-"बेवकूफ अगर वे ललकारने से नहीं भागी तो चार-चार डंडे क्यों नहीं जड दिए" नानक ने तुरंत उदास होकर उत्तर दिया- भला मैं भूखी गौ माताओं को डंडे से मारने का पाप कैसे करता, वे बेचारी खुद तो खेती करती नहीं। आदमियों के ही सहारे रहती हैं। हमारी खेती में भगवान् ने उनका भी अंश रखा होगा तभी तो आकर खा गई।

🔴 पिता ने नानक की अटपटी बातों में एक सार देखा और फिर उसके बाद कुछ नहीं कहा।

🔵 एक बार गुरु नानक खेत रखाते हुए एक पेड की छाया में लेटे हुए थे। लेटे-लेटे उनकी आँख लग गई। तभी  ऊपर से गाँव का एक परिचित व्यक्ति निकला। वह क्या देखता है कि गुरु नानक सो रहे है और उनके सिर पर एक सर्प फन फैलाए पास ही जड़ पर बैठा है। वह इस कौतुक को देखने के लिये थोडा आगे बढ़ा तो आहट पाकर सर्प चला गया। उस आदमी ने नानक को जगाया और सर्प वाली बात नहीं बतलाई, लेकिन इतना जरूर कहा बेटा! ऐसी वैसी जगह बेखबर मत सो जाया करो।

🔴 उस व्यक्ति ने इस पिषय में सुन रक्खा था कि जिसके सिर पर सर्प फन की छाया कर देता है, वह बडा भाग्यवान् और भविष्य में बडा़ आदमी होता है। उसने यह घटना नानक के पिता को बतलाकर कहा- ''भाई अपने लड़के से ऐसे-वैसे काम न लिया करो। यह बडा नक्षत्री आदमी है। संसार में बडा यश पायेगा। इसे किसी अच्छे काम में लगाओ।''

🔵 नानक के पिता ने उन्हें रुपये दिए और कहा- 'तू बडा़ नक्षत्री बतलाया जाता है। आ कुछ कार-रोजगार करके धन कमा तो जानूँ कि तू नक्षत्री है। भाग्यवान् होगा तो खूब दौलत कमाकर बड़ा आदमी बन जायेगा। गुरुनानक पैसा लेकर रोजगार करने चले तो रास्ते में सबसे पहले उनकी भेंट भूखे-नंगे भिखमगों से हो गई। नानक को उनकी दशा पर बड़ी दया आई और उन्होंने उन गरीबों को भोजन कराया और कपड़े मोल ले दिए। जो कुछ पैसा बचा उसे लेकर आगे बढे तो अनेक साधु-संतों का साक्षात्कार हो गया। उन्होंने उनका सत्संग किया और उनकी बातों तथा शिक्षण में बडा सार पाया। नानक ने बहुत समय तक जी भर उनका सत्संग किया और सारा पैसा उनकी सेवा में खर्च कर दिया। जब नानक सत्संग का लाभ उठाकर घर लौटे तो बिल्कुल खाली हाथ थे।

🔴 पिता ने पूछा- 'बता क्या रोजगार किया! लाभ की आशा है या नहीं ?'' नानक ने बडे विश्वास से और हर्ष के साथ उत्तर दिया-रोजगार तो मैंने किया जिसका अवसर जल्दी-जल्दी किसी को मिलता नहीं और अगर मिलता भी है तो दुर्भाग्य से उसका साहस नहीं पडता। जहाँ तक लाभ की बात है, सो तो लोक से परलोक तक और जन्म से जन्मांतर तक लाभ ही लाभ है।

🔵 पिता की कुछ समझ में नहीं आया बोले- साफ-साफ बतला क्या कमाई की, और ला कमाई कहाँ है ?" नानक ने सारी घटना बतला दी तो पिता ने हताश होकर कहा-राम जाने तू कैसा नक्षत्री है, नानक के इन्हीं गुणों ने उन्हें एक विख्यात संत बनाकर संसार से तार दिया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 159, 160

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...