शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 15) 26 Nov

🌹 गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है

🔵  पाठकों को हमारा आशय समझने में भूल न करनी चाहिए। हम ब्रह्मचर्य की अपेक्षा विवाहित जीवन को अच्छा बताने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। ब्रह्मचर्य एक अत्यन्त उपयोगी और हितकारी साधना है इसके लाभों की कोई गणना नहीं हो सकती। इन पंक्तियों में हम मानसिक असंयम और विवाहित जीवन की तुलना कर रहे हैं। जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य की साधना में अपने को समर्थ न पावें, जो मानसिक वासना पर काबू न रख सकें उनके लिए यही उचित है कि विवाहित जीवन व्यतीत करें। होता भी ऐसा ही है सौ में से निन्यानवे आदमी गृहस्थ जीवन बिताते हैं। इस स्वाभाविक प्रक्रिया में कोई अनुचित बात भी नहीं है।

🔴  यह सोचना ठीक नहीं कि गृहस्थाश्रम में बंधने से आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। आत्मा को ऊंचा उठाकर परमात्मा तक ले जाना यह पुनीत आत्मिक साधना अन्तःकरण की भीतरी स्थिति से सम्बन्ध रखती है। बाह्य जीवन से इसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। जिस प्रकार ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ या संन्यासी आत्म-साधना द्वारा जीवन लक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं वैसे ही गृहस्थ भी कर सकता है। सदा सनातन काल से ऐसा होता आया है। अध्यात्म साधकों में गृहस्थ ही हम अधिक देखते हैं। 

🔵  प्राचीन काल के ऋषिगण आज के गैर जिम्मेदार और अव्यवस्थित बाबाजीओं से सर्वथा भिन्न थे। धनी बस्ती न बसाकर स्वच्छ वायु को दूर-दूर घर बनाना, पक्के मकान न बनाकर छोटी झोंपड़ियों में रहना, वस्त्रों से लदे न रहकर शरीर को खुला रखना आदि उस समय की साधारण प्रथायें थीं। उस समय के राजा तथा देवताओं के जो चित्र मिलते हैं उससे वे सब भी कटि वस्त्र के अतिरिक्त और कोई कपड़ा पहने नहीं दीखते। यह उस समय की परिपाटी थी। आज जिस वेश-भूषा की नकल करके लोग अपने को साधु मान लेते हैं वह पहनाव-उढ़ाव, रहन-सहन उस समय में सर्व साधारण का था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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