शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 16)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पीली मक्खियाँ

🔵 पर इन बेचारी मक्खियों को ही क्यों कोसा जाये? उन्हीं को मूर्ख क्यों कहा जाये? जबकि आज हम मनुष्य भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं। इस सृष्टि में जो विपुल उपभोग सामग्री परमात्मा ने पैदा की है, वह उसके सभी पुत्रों के लिए मिलकर- बाँटकर खाने और लाभ उठाने के लिए है पर हममें से हर कोई जितना हड़प सके, उतने पर कब्जा जमाने के लिए उतावला हो रहा है। यह भी नहीं सोचा जाता कि शरीर की कुटुम्ब की आवश्यकता थोड़ी ही है उतने तक सीमित रहें, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं पर कब्जा जमाकर दूसरों को क्यों कठिनाई में डालें और क्यों मालिकी का व्यर्थ बोझ सिर पर लादे, जबकि उस मालिकी को देर तक अपने कब्जे में रख नहीं सकते। 

🔴 पीली मक्खियों की तरह मनुष्य भी अधिकार लिप्सा के स्वार्थ और संग्रह में अन्धा हो रहा है। मिल- बाँटकर खाने की नीति उसकी समझ में ही नहीं आती, जो कोई उसे अपने स्वार्थ में बाधक होते दीखता है, उसी पर आँखें दिखाता है, अपनी शक्ति प्रदर्शित करता है और पीली मक्खियों की तरह टूट पड़ता है, इससे उनके इस व्यवहार से कितना कष्ट होता है इसकी चिन्ता किसे है?  

🔵 पीली मक्खियाँ नन्हें- नन्हें डर मारकर आधा मील पीछा करके वापिस लौट गई, पर मनुष्य की अधिकार लिप्सा, स्वार्थपरता और अहंकार से उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता को जब सोचता हूँ  तो बेचारी पीली मक्खियों को ही बुरा- भला कहने में जीभ सकुचाने लगती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/himalaya%20_me_pravesh/pili_makhiya

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