शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 65)

🌹 युग-निर्माण की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

🔴 99. अविच्छिन्न दान परम्परा— नित्य कुछ समय और कुछ धन परमार्थ कार्यों के लिये देते रहने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दान हमारे जीवन की एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक परम्परा के रूप में चलता रहे। इस प्रकार अपनी आजीविका का एक अंश नियमित रूप से परमार्थ के लिये लगाया जाता रहे। इसके लिये कोई धर्मपेटी या धर्मघट में अन्न या पैसा डालते रहा जाय। यह धन केवल सद्भावना प्रसार के यज्ञ में ही खर्च हो, युग-निर्माण का आधार यही तो है।

इसी प्रकार धर्म प्रचार के लिये, जन सम्पर्क के लिये कुछ समय भी नित्य दिया जाय। नित्य न बन पड़े तो साप्ताहिक अवकाश के दिन अधिक समय दे करके दैनिक क्रम की पूर्ति की जाय। सद्भावनाओं के प्रसार और जागरण के लिए जन सम्पर्क ही प्रधान उपाय है। इसमें झिझक या संकोच करने की, अपमान अनुभव करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

🔵 100. सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना— सामाजिक कुरीतियों एवं नैतिक बुराइयों को मिटाने के लिये राग-द्वेष से रहित, संयमी, मधुर व्यवहार वाले और दृढ़ चरित्र व्यक्तियों की एक ऐसी सत्याग्रही सेना गठित की जानी है, जो दूसरों को बिना कष्ट पहुंचाये अपने ही त्याग, तप से बुराइयां छुड़ाने के लिये कष्ट सहने को तैयार हों। सत्याग्रह कहां, किस प्रकार किया जाय यह एक बहुत ही दूरदर्शिता का प्रश्न है। अन्यथा सुधार के स्थान पर द्वेष फैल सकता है। इन सब बातों का ध्यान रखते हुए सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना का गठन और उसके द्वारा बुराइयों के उन्मूलन की व्यवस्था भी करनी ही पड़ेगी। इसके लिये उपयुक्त व्यक्तियों को अपना नाम स्वयं सेवकों की श्रेणी में लिखाना चाहिये। शक्ति को देखते हुये वैसे ही कार्यक्रम आरम्भ किये जावेंगे और पहले उन्हें प्रशिक्षित भी करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...