शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 10) 7 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 जेम्स ऐलेन ने अपनी पुस्तक ‘फ्रॉम प्रॉपर्टी टू प्रॉस्पर्टी’ की शुरुआत इन पंक्तियों से की है, ‘वेदना दुख और अपवाद जीवन की परछाइयां हैं। संसार में एक भी हृदय ऐसा नहीं मिलेगा, जिसे दुःख ने स्पर्श न किया हो। एक भी मन ऐसा नहीं होगा जिस पर कोई न कोई घाव न लगा हो, एक भी आंख ऐसी नहीं होगी, जिसने कभी न कभी खून के आंसू न टपके हों। संसार में एक भी परिवार ऐसा नहीं है, जिसमें मृत्यु ने प्रवेश न किया हो और जो रोग और मृत्यु से त्रस्त न रहा हो, जिसने सगे-सम्बन्धियों का विछोह न देखा हो। बिल्ली जिस प्रकार चूहे को दबोचती है, दुख का मजबूत पंजा मनुष्य को उसी प्रकार अचानक आ दबोचता है। तो क्या दुःख और विषाद से बचने का कोई मार्ग नहीं?

🔴 क्या विपदा की जंजीरों को तोड़ फेंकने का कोई उपाय नहीं? क्या स्थाई समृद्धि शक्ति और आनन्द के स्वप्न देखना मूढ़ता पूर्ण है? नहीं मुझे यह कहते हुए हर्ष होता है कि विपदा को समाप्त कर देना सम्भव है। ऐसा एक उपाय, ऐसी एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा रोग दरिद्रता अथवा विपरीत परिस्थितियों को हमेशा के लिए समाप्त करके स्थाई समृद्धि लाई जा सकती है और मनुष्य विपदा तथा दरिद्रता के दोबारा लौट आने के भय से मुक्ति प्राप्त करके स्थाई आनन्द और शान्तिमय जीवन जी सकता है। ऐसे सुख और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करने का एक मात्र उपाय यह है कि मनुष्य दुःख के वास्तविक स्वरूप को भलीभांति समझ ले।

🔵 क्या है दुःख का वास्तविक स्वरूप? दुख और कुछ नहीं सुख के अभाव का ही नाम है। प्रकाश के अभाव का नाम अन्धकार है। प्रिय परिस्थितियां नहीं होतीं तो अप्रिय की अनुभूति होती है। अनुकूलता के अभाव में प्रतिकूलता भासती है। इन दोनों स्थितियों में सामंजस्य स्थापित किया जा सके तो प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न और प्रफुल्ल रहा जा सकता है। प्रश्न उठता है कि यह सामंजस्य किस प्रकार स्थापित किया जाये? उत्तर एक ही है, तथ्यों के प्रति सन्तुलित और समझ पूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाय। यह मान्यता बनाकर चला जाये कि दिन और रात की तरह मनुष्य के जीवन में प्रिय और अप्रिय घटनाक्रम आते-जाते रहते हैं। इन उभयपक्षी अनुभूतियों से ही जीवन की सार्थकता और शोभा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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