सोमवार, 12 मार्च 2018

👉 गुरुगीता (भाग 63)

👉 चेतना के रहस्यों का जानकार होता है सद्गुरु

🔷 गुरुगीता अध्यात्मविद्या का परम दुर्लभ शास्त्र है। इस परम शास्त्र के प्रवर्तक भगवान् शिव का कथन है कि अध्यात्म साधना में परम अनिवार्य तत्त्व है ‘गुरुभक्ति का जागरण’। साधक में यदि गुरुभक्ति का विकास हो जाए, तो अध्यात्म साधना सहज ही विकसित एवं फलित होने लगती है। साधक की निर्मल एवं निष्कपट भावनाएँ उसमें परिष्कृत चिन्तन को जन्म देती हैं। चिन्तन का परिष्कार होने से उसके कर्मों में उदात्तता आती है। तत्त्वकथा यही कहती है कि यदि भावनाएँ सँवरती हैं, तो ज्ञान एवं कर्म भी सँवर जाते हैं। गुरुभक्ति यदि अन्तःकरण में पनप सके, तो गुरुकृपा भी सहज ही अवतरित होती है। इस सद्गुरु कृपा के बल पर सहज ही आध्यात्मिक विभूतियों एवं यौगिक ऐश्वर्यों का स्वामी बन जाता है।
  
🔶 पिछले मंत्रों में यह बताया गया है कि परम पूज्य गुरुदेव की दिव्यमूर्ति ध्यान का मूल है। उनके चरण पूजा के मूल हैं। उनके वचन मंत्र मूल है। उनकी कृपा मोक्ष का मूल है। गुरुदेव ही आदि एवं अनादि हैं, उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि गुरुदेव के पाद प्रक्षालन के जल बिन्दु में सभी तीर्थों का सार समावेश है। भगवान् शिव स्वयं कहते हैं कि मेरे रूठने पर तो सद्गुरु अपने शिष्य का त्राण करने में सक्षम हैं; परन्तु यदि वही रूठ जाएँ, तो फिर कहीं भी त्रिलोकी में रक्षा नहीं हो सकती। इसलिए शिष्य को सदा अपने सद्गुरु की शरण में रहना चाहिए। उन्हीं की सब भाँति अर्चना-आराधना करनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 101

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