बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 65)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 गुरुदेव की आत्मा और हमारी आत्मा साथ-साथ चल रही थीं। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। साथ में उनके चेहरे पर भी उदासी छाई हुई थी। हे भगवान, कैसा विषम समय आया कि किसी ऋषि का कोई उत्तराधिकारी नहीं उपजा। सबका वंश नाश हो गया। ऋषि प्रवृत्तियों में से एक भी सजीव नहीं दीखती। करोड़ों की संख्या में ब्राह्मण हैं और लाखों की संख्या में संत पर उनमें से दस-बीस भी जीवित रहे होते, तो गाँधी और बुद्ध की तरह गजब दिखाकर रख देते, पर अब क्या हो गया? कौन करे? किस बलबूते पर करे?

🔵 राजकुमारी की आँखों से आँसू टपकने पर और कहने पर कि ‘‘को वेदान् उद्धरस्यसि?’’ अर्थात् ‘‘वेदों का उद्धार कौन करेगा?’’ इसके उत्तर में कुमारिल भट्ट ने कहा था कि-‘‘अभी एक कुमारिल भट्ट भूतल पर है। इस प्रकार विलाप न करो।’’  तब एक कुमारिल भट्ट जीवित था। उसने जो कहा था, सो कर दिखाया, पर आज तो कोई नहीं। न ब्राह्मण है, न संत। ऋषियों की बात तो बहुत आगे की है। आज तो छद्म वेशधारी ही चित्र-विचित्र रूप बनाए रंगे सियारों की तरह पूरे वन प्रदेश में हुआ -हुआ करते फिर रहे हैं|

🔴 दूसरे दिन लौटने पर हमारे मन में इस प्रकार के विचार दिन भर उठते रहे। जिस गुफा में निवास था, दिन भर यही चिंतन चलता रहा। लेकिन गुरुदेव उन्हें पूरी तरह पढ़ रहे थे, मेरी कसक उन्हें भी दुःख दे रही थी। उनने कहा-‘‘तब फिर ऐसा करो! अब की बार उन सबसे मिलने फिर से चलते हैं। कहना-आप लोग कहें तो उसका बीजारोपण तो मैं कर सकता हूँ। खाद-पानी आप देंगे, तो फसल उग पड़ेगी। अन्यथा प्रयास करने से अपना मन तो हल्का होगा ही।’ ‘‘साथ में यह भी पूछना कि शुभारम्भ किस प्रकार किया जाए, इसकी रूपरेखा बताएँ। मैं कुछ न कुछ अवश्य करूँगा। आप लोगों का अनुग्रह बरसेगा तो इस सूखे श्मशान में हरीतिमा उगेगी।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav.2

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...