बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 25)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 इस स्थिति को देखते हुए तो यही समझ में आता है कि या तो मनुष्य प्रसन्नता के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचाना अथवा वह अपनी वांछित वस्तु को पाने के लिए जिस दिशा में प्रयत्न करता है वह ही गलत है। इस पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।

🔵 लोगों में अधिकतर एक सामान्य धारणा यह रहा करती है कि यदि उनके पास अधिक पैसा हो, साधन-सुविधायें हों तो वे प्रसन्न रह सकते हैं। ऐसी धारणाओं वाले लोग सदैव साधन सुविधाओं के लिए रोते रिरियाते रहने के बजाय एक बार दृष्टि उठाकर उन लोगों की ओर क्यों नहीं देखते कि प्रचुरता से परिपूर्ण होने पर भी क्या वे सुखी हैं, प्रसन्न और सन्तुष्ट हैं? यदि धन दौलत तथा साधन सुविधायें ही प्रसन्नता की हेतु होतीं तो संसार का हर धनवान अधिक से अधिक सुखी और सन्तुष्ट होता किन्तु ऐसा कहां है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि वैभव और विभूति वास्तविक प्रसन्नता का कारण नहीं है। प्रसन्नता प्राप्ति का हेतु मानकर इन विभूतियों के लिए रोते-मरते रहना बुद्धिमानी नहीं हैं।

🔴 बल, बुद्धि और विद्या को भी प्रसन्नता का हेतु मानने की एक सभ्य प्रथा है। किन्तु यह ऐश्वर्य भी वास्तविक प्रसन्नता का वाहक नहीं है। यदि ऐसा होता तो हर शिक्षित प्रसन्न दिखाई देता और अशिक्षित अप्रसन्न। ऐसा भी देखने में नहीं आता। जिस प्रकार अनेक धनवान अप्रसन्न और निर्धन प्रसन्न देखे जा सकते हैं इसी प्रकार अनेक विद्वान क्षुब्ध तथा पढ़े-लिखे लोग प्रसन्न मिल सकते हैं। बड़े-बड़े बलवान आहें भरते और साधारण सामर्थ्य वाले व्यक्ति हंसी खुशी से जीवन बिताते मिल सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...