बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 प्रथम आहुति-पूर्णाहुति

🔴 डचों का आक्रमण अप्रत्याशित था। इंडोनेशियाई सैनिक उसके लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थे। अब दो ही विकल्प सामने थे-एक तो डचों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया जाए अन्यथा जो भी शक्ति है, उसे ही लेकर सकट का संपूर्ण साहस के साथ सामना किया जाए।

🔵 कोई भी स्वाभिमानी जाति अपने सम्मान, संस्कृति और स्वाधीनता की रक्षा के लिये जो निर्णय ले सकती है, वही निर्णय इडोनेशियाई सैनिकों ने लिया अर्थात् उन्होंने जीवन की अंतिम साँस तक लडने और डचों का सामना करने का संकल्प ठान लिया।

🔴 कमांडरों की बैठक हुई और योजना बनाई गई कि सेना को कई छोटी-छोटी टुकडि़यों में बाँटकर छापा मार युद्ध किया जाए।

🔵 सीमित शक्ति से असीमित का मुकाबला साहस और शौर्य का ही परिचायक होता है।

🔴 इधर जिन सैनिको को, जिस टोली में जाने का आदेश मिलता, वह आनन-फानन मे तैयार होकर चल पडता ऐसा शौर्य इंडोनेशियायियों में इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला था।

🔵 जब यह सब हो रहा था, सेना का एक जवान जिसका नाम था सुवर्ण मार्तंडनाथ। मिलिटरी हेड क्वार्टर में लगाइ गई पहली टोली में जाने वालों के नामों की सूची बडे ध्यान से पढ़ रहा था। सब नाम पढ लिए और जब उसे अपना नाम नहीं मिला तो उसकी आँखे भर आई, पहली टोली में नाम न पाने का बडा दुर्भाग्य मनाया उसने। क्या किया जाए ? अभी वह यह सोच ही रहा था कि ''फील्ड सर्विस मार्चिग आडर'' (युद्ध की पूर्ण सज्जित वेष-भूषा) में उसके बडे भाई ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा-क्यों सुवर्ण अपना नाम न पाकर तुम दुःख कर रहे हो, इसमे दुःख की क्या बात बलिदान सबको होना है, क्या आगे-क्या पीछे ?

🔴 मार्तंडनाथ की भरी आँखें बरस पडी, हृदय का गुबार कपोलो से बह निकला-उसने अपने भाई के पाँव पकड लिए और रुँधे गले से कहा-भैया! आप यह सौभाग्य मुझे नही दे सकते क्या ? मेरा हठ आपको स्वीकार करना ही होगा छोटा हूँ तो क्या ? उत्सर्ग का प्रथम अधिकार मुझे मिलना चाहिए।

🔵 बडे भाई ने बडे स्नेह से सुवर्ण के आँसू पोंछते हुए कहा-तात! मोमबत्ती के सभी कण पहले जलने के लिये उलझ पडे तो फिर मोमबत्ती के लिए देर तक प्रकाश दे सकना कहाँ संभव रह जाए ? वह उलझकर बुझ न जायेगी। जिद न करो आज नहीं तो कल तुम्हारी बारी आनी ही है।

🔴 उत्सर्ग का सुख जानने वाले सुवर्ण मार्तंडनाथ के लिए और सारे शब्द शूल से लग रहे थे वह तो पहली टोली से स्वयं जाने की आशा मात्र का अभिलाषी था। आखिर कमांडरों को उसकी जिद के आगे झुकना पड़ा। उसका नाम पहली टोली में चढा दिया गया।

🔵 बडे भाई का नाम अंतिम टुकडी में आया। कई दिन के घनघोर युद्ध के बाद विजय इंडोनेशिया की रही। स्वाधीनता के लिए शहीद होने वालो की सूची निकाली गई। युवक सुवर्ण मार्तंडनाथ ने उसे लेकर जैसे ही दृष्टि डाली कि उसमें पहला ही नाम उसके बड़े भाई का मिला। "पूर्णाहुति का सौभाग्य आखिर आपको ही मिला" इतना कहते-कहते एकबार सुवर्ण मार्तंडनाथ की आँखें भर आई, उससे पूरी लिस्ट पढी नही गई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 58, 59

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