बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 3)

🌹 चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तार

🔵 इस सम्मिश्रण का जहाँ भी अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत स्वरूप दिखाई पड़ता है, उसे प्रतिभा कहते हैं। सदुद्देश्यों के लिये प्रयुक्त किये जाने पर यही प्रतिभा देव-स्तर की बन जाती है और अपना परिचय महामानवों जैसा देती है, किंतु साथ ही यदि मनुष्य अपनी उपलब्ध स्वतंत्रता का उपयोग अनुचित कामों में करने लगे तो वह दुरुपयोग ही दैत्य बन जाता है। दैत्य अपने और अपने संपर्क वालों के लिये विपत्ति का कारण ही बनते है; जबकि देवता पग-पग पर अपनी शालीनता और उदारता का परिचय देते हुए अपने प्रभाव-क्षेत्र में सुख, शांति एवं प्रगति का वातावरण बनाते रहते हैं। दैत्य-स्तर के अभ्यास बन जाने पर तो पतन और पराभव ही बन पड़ता है। उसमें तात्कालिक लाभ दीखते हुए भी अंतत: दुर्गुणों का दुष्परिणाम ही प्रत्यक्ष होता है।       

🔴 सृष्टि के नियम में कर्म और फल के बीच कुछ समय लगने का विधान है। बीज बोने पर उससे वृक्ष बनने में कुछ समय लग जाता है। गर्भाधान के कई मास बाद बच्चा उत्पन्न होता है। आज का दूध कहीं कल जाकर दही बनता है। अभक्ष्य खा लेने पर दस्त-उल्टी आदि होने का सिलसिला कुछ समय बाद आरंभ होता है। मनुष्यों मेें यह बालबुद्धि देखी जाती है कि वे तत्काल कर्मफल चाहते हैं, देर लगने पर अधीर हो जाते हैं और यह चाहते हैं कि हथेली पर सरसों जमे; कल तक उसमें पौधे जमने की प्रतीक्षा न करनी पड़े।     

🔵 उतावली आतुरता उत्पन्न करती है और मन:स्थिति प्राय: अर्धविक्षिप्त की-सी बना देती है, जिसमें तात्कालिक लाभ भर दीख पड़ता है; चाहे वह कितना ही क्षणिक या दु:खदाई ही क्यों न हो। वह विवेकवान् दूरदर्शिता न जाने कहाँ चली जाती है जिसे अपनाकर विद्यार्थी विद्वान्, दुबले पहलवान, मंदबुद्धि तीव्रबुद्धि एवं निर्धन और पिछड़े धनवान् बनते हैं। यह एक मनुष्य की प्रधान भूल है, जिसके कारण वह अपने जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और वरिष्ठता तक भूल जाता है-मार्ग से भटककर झाड़-झंखाड़ों में मारा-मारा फिरता है। इस भूल को देखकर कई बार यह भी स्वीकारना पड़ता है कि ‘‘मनुष्य वस्तुत: ईश्वर की संतान तो है ही नहीं वरन् डार्विन के कथनानुसार वह बंदर की ही अनगढ़ औलाद है।’’  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रकाश की आवश्यकता हमें ही पूरा करनी होगी

🔷 आज का संसार अन्धविश्वासों और मूढ़ मान्यताओं की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। इन जंजीरों से जकड़े हुए लोगों की दयनीय स्थिति पर मुझे तरस आत...