बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 7)

🌹 दीक्षा क्या? किससे लें?
🔴 व्यक्तिगत रूप से (गुरु बनकर) दीक्षा देना भी सम्भव है  लेकिन वह हर आदमी का काम नहीं है। जिस आदमी के पास इतना प्राण तत्त्व और इतना उत्कृष्ट जीवन और इतना अटूट आत्मबल न हो; जो अपने आत्मबल की सम्पदा में से, अपने तप की पूँजी में से, अपने ज्ञान की राशि में से, दूसरों को महत्त्वपूर्ण अंश देने में समर्थ न हो, ऐसे आदमी को दीक्षा नहीं देनी चाहिए और न ऐसों से किसी को दीक्षा लेनी चाहिये। यदि उनसे  लिया गया है, तो उससे हानि भी हो सकती है। मान लीजिए कोई पति तपेदिक का बीमार है या सिफिलिस का बीमार है या सुजाक का बीमार है, उसके साथ में बीबी ब्याह कर ले, तो जहाँ पति रोटी कमाकर के खिला सकता है, वहाँ उसकी वह बीमारियाँ भी उसकी पत्नी में आ जायेगी और उसका जीवन चौपट हो जायेगा।

🔵 बिना समझे-बूझे कोई भी आदमी आजकल दीक्षा देने लगते हैं, ताकि रुपया-अठन्नी का ही लाभ होने लग जाय और पैर पुजाने का लाभ होने लगे और अपना गुजारा चलने लगे और फोकट का सम्मान भी मिलने लगे। ये बहुत ही बेहूदी बात है और इस तरह  की हिम्मत जो आदमी करते हैं, वे बहुत ही जलील आदमी हैं। ऐसे जलील आदमियों को इस समाज में से  एक कोने में उठाकर फेंक देना चाहिए। दीक्षा के लिए कोई आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति से ही दीक्षा ली जाए। कोई जरूरी नहीं है। दीक्षा का अर्थ प्रतिज्ञा है। दीक्षा का अर्थ वह होता है कि किसी आदमी के साथ जुड़कर के उसकी तपश्चर्या, उसका ज्ञान और उसके आत्मबल की सम्पदा का व्यक्तिगत रूप से लाभ उठाया जाए, ये भी एक तरीका है; लेकिन मैं देखता हूँ  कि आज ऐसे आदमी दुनिया में लगभग नहीं हैं।  

🔴 योग विशेष से सैकड़ों वर्ष पीछे कोई-कोई ही ऐसे आदमी पैदा होते हैं। वह पैदा होते हैं, जिनके पास वशिष्ठ जैसा ज्ञान और विश्वामित्र जैसा तप दोनों का समुचित रूप से समन्वय हो और यदि इन दो आवश्यकताओं को पूरा करने वाला नहीं है, तो निरर्थक है। उसकी दीक्षा से कोई फायदा नहीं है, बल्कि और भी अज्ञान फैल सकता है। दूसरे और भी आदमियों को चालाकी और धूर्तता करने का मौका मिल सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/8

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