बुधवार, 1 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 66)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू
🔵 आरम्भिक दिनों मे हमें उपहास और भर्त्सना सहनी पड़ी। घर परिवार के लोग ही सबसे अधिक आड़े आये। उन्हें लगने लगा कि इसकी सहायता से जो भौतिक लाभ हमें मिलते हैं या मिलने वाले हैं उनमें कमी आ जायेगी, सो वे अपनी हानि जिसमें समझते, उसे भारी मूर्खता बताते थे, पर यह बात देर तक नहीं चली। अपनी आस्था ऊँची और सुदृढ़ हो, तो झूठ, विरोध देर तक नहीं टिकता, कुमार्ग पर चलने के कारण जो विरोध, तिरस्कार उत्पन्न होता है वही स्थिर रहता है। नेकी अपने आप में एक विभूति है, जो स्वयं का ही नहीं सभी का हित साधती है, इसीलिए स्थिर रहती भी है। विरोधी और निंदक कुछ ही दिनों में अपनी भूल समझ जाते हैं और रोड़ा अटकाने के बजाय सहयोग देने लगते हैं।

🔴 आस्था जितनी ऊँची और जितनी मजबूत होगी, प्रतिकूलता उतनी ही जल्दी अनुकूलता में बदल जाती है। परिवार का विरोध देर तक नहीं सहना पड़ा, उनकी शंका- कुशंका वस्तु स्थिति समझ लेने पर दूर हो गई। आत्मिक जीवन में वस्तुत: घाटे की कोई बात नहीं है। बाहरी दृष्टि से गरीब दीखने वाला व्यक्ति आत्मिक दृष्टि शान्ति और सन्तोष के कारण बहुत प्रसन्न रहता है। यह प्रसन्नता और सन्तुष्टि हर किसी को प्रभावित करती है। जो विरोधियों को सहयोगी बनाने में बहुत सहायक सिद्ध होती है। अपनी कठिनाई ऐसे ही हल हुई।

🔵 बड़प्पन का लोभ- मोह, वाहवाही की- तृष्णा की हथकड़ी- बेड़ी और तौक कटी तो लगा कि भव- बंधनों से मुक्ति मिल गयी। इन्हीं तीन जंजीरों में जकड़ा हुआ प्राणी इस भवसागर में औंधे मुँह घसीटा जाता रहता है और अतृप्ति, उद्विग्नता कि व्यथा वेदना से कराहता रहता है। इन तीनों की तुच्छता समझ ली जाय और लिप्सा को श्रद्धा में बदल दिया जाय, तो समझना चाहिए कि माया के बंधन टूट गए और जीवित रहते ही मुक्ति पाने का प्रयोजन पूरा हो गया। "नजरें तेरी बदलीं कि नजारा बदल गया" वाली उक्ति के अनुसार अपनी भावनाएँ, आत्मज्ञान होते ही समाप्त हो गईं और जीवन लक्ष्य पूरा करने की आवश्यकता अँगुली पकड़ कर मार्गदर्शन करने लगी, फिर अभाव रहा न असंतोष।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.2

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