शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 38) 29 Jan

🌹 अभियान साधना के नियम
🔴 अभियान साधकों को गुरुवार के दिन प्रमुखतः तीन नियमों का पालन करना होता है उपवास, मौन और ब्रह्मचर्य। इन तीनों का जितनी ही कड़ाई के साथ पालन किया जाय उतना ही उत्तम है। उपवास में हो सके तो दूध, छाछ, रस जैसे पेय पदार्थ ही लिए जाएं तो सर्वोत्तम है। किन्तु इससे काम न चले तो शाकाहार भी लिया जा सकता है। इतना भी कठिन पड़े तो एक समय भोजन किया जा सकता है। उस एक समय के भोजन में अस्वाद व्रत का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए। नमक और शक्कर दोनों में से एक भी न लिया जाय।

🔵 यह स्वाद संयम जिव्हा संयम का एक पक्ष है। इसका दूसरा पक्ष है—संतुलित और सुसंस्कृत भाषण। इसके लिए पुराने अभ्यास को रोकने और नया अभ्यास आरम्भ करने का मध्यम उपाय मौन है। पूरे दिन मौन रखना तो कामकाजी व्यक्ति के लिए कठिन पड़ता है पर प्रातःकाल अथवा जब भी सुविधा हो दो घण्टे की मौन साधना बिना किसी अड़चन के की जा सकती है। जितने समय मौन रहा जाय, वह समय मनन, चिन्तन में लगाया जाय। मनन का अर्थ है—आत्मचिन्तन, अपनी वर्तमान स्थिति का आलोचक की दृष्टि से विवेचन।

🔴 इस विवेचन से अपने भीतर जो दोष, दुर्गुण दिखाई दें, जो आदतें अनुपयुक्त जान पड़े, उनके निराकरण की योजना बनाना तथा जिन सत्प्रवृत्तियों का अपने में अभाव है, उनके अभिवर्धन की योजना बनाना, इसी का नाम चिन्तन है। अपना आत्म-विवेचन मनन है और त्रुटियों के निराकरण तथा सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की योजना बनाना चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हीं दो कार्यों में चित्त को मौन की अवधि में व्यस्त रहना चाहिए। स्मरण रखा जाय कि मौन का अर्थ मात्र चुपचाप बैठे रहना नहीं है। इस अवधि को एकांत में बिताना चाहिए। मुंह से कुछ न बोलकर जबान बन्द रखकर भी इशारेबाजी की जाती है तो उससे मौन का प्रयोजन पूरा नहीं होता। यह आत्मश्लाघा तो मौन न रखने से भी बुरी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

1 टिप्पणी:

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