शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 36)

🌹  गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴  गुरुदेव द्वारा हमारी हिमालय बुलावे की बात मत्स्यावतार जैसी बढ़ती चली गयी। पुराण की कथा है कि ब्रह्माजी के कमण्डलु में कहीं से एक मछली का बच्चा आ गया। हथेली में आचमन के लिए कमण्डलु लिया तो वह देखते-देखते हथेली भर लम्बी हो गयी। ब्रह्माजी ने उसे घड़े में डाल दिया क्षण भर में वह उससे भी दूनी हो गयी तो ब्रह्माजी ने उसे पास के तालाब में डाल दिया, उसमें भी वह समाई नहीं तब उसे समुद्र तक पहुंचाया गया। देखते-देखते उसने पूरे समुद्र का आच्छादित कर लिया। तब ब्रह्माजी को बोध हुआ। उस छोटी सी मछली में अवतार होने की बात जानी, स्तुति की और आदेश मांगा, बात पूरी होने पर मत्स्यावतार अन्तर्ध्यान हो गये और जिस कार्य के लिए वे प्रकट हुए थे वह कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न हो गया।

🔵  हमारे साथ भी घटना क्रम ठीक इसी प्रकार चले हैं। आध्यात्मिक जीवन वहां से आरम्भ हुआ था जहां कि गुरुदेव ने परोक्ष रूप महामना जी से गुरु दीक्षा दिलवायी थी। यज्ञोपवीत पहनाया था और गायत्री मन्त्र की नियमित उपासना करने का विधि-विधान बताया था। छोटी उम्र थी पर उसे पत्थर की लकीर की तरह माना और विधिवत् निबाहा। कोई दिन ऐसा नहीं बीता जिसमें नागा हुई हो। साधना नहीं तो भोजन नहीं। इस सिद्धान्त को अपनाया। वह आज तक ठीक चला है और विश्वास है कि जीवन के अन्तिम दिन तक यह निश्चित रूप से निभेगा।

🔴  इसके बाद गुरुदेव का प्रकाश रूप में साक्षात्कार हुआ। उनने आत्मा को ब्राह्मण बनाने के निमित्त 24 वर्ष की गायत्री पुरश्चरण साधना बताई। वह भी ठीक समय पर पूरी हुई। इस बीच में बैटरी चार्ज कराने के लिए- परीक्षा देने के लिए बार-बार हिमालय आने का आदेश मिला। साथ ही हर यात्रा में एक-एक वर्ष या उससे कम दुर्गम हिमालय में ही रहने के निर्देश भी। वह क्रम भी ठीक प्रकार चला और परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर नया उत्तरदायित्व भी कन्धे पर लदा। इतना ही नहीं उसका निर्वाह करने के लिए अनुदान भी मिला, ताकि दुबला बच्चा लड़खड़ा न जाय। जहां गड़बड़ाने की स्थिति आई वहीं मार्गदर्शक ने गोदी में उठा लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Awakening the Inner Strength

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