मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 52)

🔵 सुनहरी धूप ऊंचे पर्वत शिखरों से उतर कर पृथ्वी पर कुछ देर के लिए आ गई थी। मानो अविद्याग्रस्त हृदय में सत्संगवश स्वल्पस्थायी ज्ञान उदय हो गया। ऊंचे पहाड़ों की आड़ में सूरज इधर उधर ही छिपा रहता है केवल मध्यान्ह को ही कुछ घण्टों के लिये उनके दर्शन होते हैं उनकी किरणें सभी सुकुड़ते हुए जीवों में चेतना की एक लहर दौड़ा देती हैं। सभी में गतिशीलता और प्रसन्नता उमड़ने लगती है। आत्म ज्ञान का सूर्य भी प्रायः वासना और तृष्णा की चोटियां के पीछे छिपा रहता है पर जब कभी जहां कहीं वह उदय होगा वहीं उसकी सुनहरी रश्मियां एक दिव्य हलचल उत्पन्न करती हुई अवश्य दिखाई देंगी।

🔴 अपना शरीर भी स्वर्णिम रश्मियों का आनन्द लेने के लिए कुटिया से बाहर निकला और मखमल के कालीन सी बिछी हरी घास पर टहलने की दृष्टि से एक ओर चल पड़ा। कुछ ही दूर रंग-बिरंगे फूलों का एक बड़ा पठार था। आंखें उधर ही आकर्षित हुईं और पैर उसी दिशा में उठ चले।

🔵 छोटे बच्चे अपने सिर पर रंगीन टोपे पहने हुए पास-पास बैठकर किसी खेल की योजना बनाने में व्यस्त हों ऐसे लगते थे वे पुष्प सज्जित पौधे। मैं उन्हीं के बीच जाकर बैठ गया। लगा जैसे मैं भी एक फूल हूं। यदि ये पौधे मुझे भी अपना साथी बनालें तो मुझे भी अपने खोये बचपन पाने का पुण्य अवसर मिल जाय।

🔴 भावना आगे बढ़ी। जब अन्तराल हुलसता है तो तर्कवादी कुतर्की विचार भी ठण्डे पड़ जाते हैं। मनुष्य के भावों में प्रबल रचना शक्ति है वे अपनी दुनिया आप बसा लेते हैं। काल्पनिक ही नहीं शक्तिशाली भी सजीव भी। ईश्वर और देवताओं तक ही रचना उसने अपनी भावना के बल पर की है और उनमें अपनी श्रद्धा को पिरोकर उन्हें इतना महान बनाया है जितना कि वह स्वयं है। अपने भाव फूल बनने को मचले तो वैसा ही बनने में देर न थी। लगा कि इन पंक्ति बनाकर बैठे हुए पुष्प बालकों ने मुझे भी सहचर मान कर मुझे भी अपने खेल में भाग लेने के लिए सम्मिलित कर लिया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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