मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 38)

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 अर्द्ध वार्षिक साधनायें आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में नौ-नौ दिन के लिये की जाती हैं। इन दिनों गायत्री मंत्र के २४ हजार जप की परम्परा पुरातन काल से चली आती है। उसका निर्वाह सभी आस्थावान साधकों को करना चाहिये। बिना जाति या लिंगभेद के इसे कोई भी अध्यात्म प्रेमी नि:संकोच कर सकता है। कुछ कमी रह जाने पर भी इस सात्विक साधना में किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका नहीं करना चाहिए। नौ दिनों में प्रतिदिन २७ माला गायत्री मंत्र के जप कर लेने से २४ हजार निर्धारित जप संख्या पूरी हो जाती है। अंतिम दिन कम से कम २४ आहुतियों का अग्निहोत्र करना चाहिए। अंतिम दिन अवकाश न हो तो हवन किसी अगले दिन किया जा सकता है।     

🔵 अनुष्ठानों में कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है- (१) उपवास अधिक न बन पड़े तो एक समय का भोजन या अस्वाद व्रत का निर्वाह तो करना ही चाहिए। (२) ब्रह्मचर्य पालन - यौनाचार एवं अश्लील चिंतन का नियमन। (३) अपनी शारीरिक सेवाएँ यथासंभव स्वयं ही करना। (४) हिंसायुक्त चमड़े के उपकरणों का प्रयोग न करना। पलंग की अपेक्षा तखत या जमीन पर सोना। इन सब नियमों का उद्देश्य यह है कि नौ दिन तक विलासी या अस्त-व्यस्त निरंकुश जीवन न जिया जाए। उसमें तप संयम की विधि व्यवस्था का अधिकाधिक समावेश किया जाए। नौ दिन का अभ्यास अगले छह महीने तक अपने आप पर छाया रहे और यह ध्यान बने रहे कि संयमशील जीवन ही आत्मकल्याण तथा लोकमंगल की दुहरी भूमिका संपन्न करता है। इसलिए जीवनचर्या को इसी दिशाधारा के साथ जोड़ना चाहिए।     
                        
🔴 अनुष्ठान के अंत में पूर्णाहुति के रूप में प्राचीन परंपरा ब्रह्मभोज की है। उपयुक्त ब्राह्मण न मिल सकने के कारण इन दिनों वह कृत्य नौ कन्याओं को भोजन करा देने के रूप में भी पूरा किया जाता है। कन्यायें किसी भी वर्ण की हो सकती हैं। इस प्रावधान में नारी को देवी स्वरूप में मान्यता देने की भावना सन्निहित है। कन्यायें तो ब्रह्मचारिणी होने के कारण और भी अधिक पवित्र मानी जाती हैं।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

1 टिप्पणी:

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

🔴 कुछ नई स्कीम है, जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, लेकिन जग...