गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 55)

🔵 वत्स! छोटी छोटी बातों पर ध्यान न दो। जब विश्वस्वरूप स्वयं तुम पर प्रकाशित हो उठा है तब व्यौरों का क्या महत्त्व है। व्यौरे सब केवल भौतिक हैं। उन पर अपने मन को केन्द्रित न करो। एकत्व की चिन्ता करो, बहुत्व की नहीं। वैराग्य की भावना लेकर, ब्यौरों के क्या अनुभव आते हैं, उनकी चिन्ता न करो। स्मरण रखो तुम स्वयं ही अपने शत्रु तथा कल्याणाकांक्षी हो। अपने पूर्ण संस्कारों के सके को तुम एक ही झटके से नहीं काट सकते। एक बार तुम्हारे मन में आवश्यक संकल्प जाग उठने पर यह कार्य सरल हो जायेगा तथा मेरी कृपा और आशीर्वाद इस संकल्प को दृढ़ बनाने में तुम्हारे साथ रहेंगे। विश्वास रखो और तुम्हारे साथ सभी शुभ होगा। 
🔴  दूसरों के मतों की चिन्ता क्यों करते हो? तुम्हारी इस मनोवृत्ति से क्या लाभ होगा? जब तक तुम दूसरों के मत की अपेक्षा करते हो तब तक यह जान लो कि तुम्हारे हृदय पर अहंकार का अधिकार है। स्वयं की दृष्टि में सदाचारी बनो फिर दूसरे लोग कुछ भी कहें तुम उनकी चिन्ता नहीं करोगे। परामर्श न लो अपनी उच्च का पालन। केवल अनुभव ही तुम्हें सिखा सकता है। अपने समय को व्यर्थ की चर्चा में नष्ट न करो। इससे तुम्हें कुछ भी लाभ न होगा। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव से ही परिचालित होता है। फिर कौन किसे परामर्श दे सकता है? सर्वतोभावेन स्वयं पर निर्भर रहो। मार्गदर्शन के लिये स्वयं के पास जाओ। दूसरों के पास नहीं।

🔵 तुम्हारी निष्ठा तुम्हें दृढ़ता प्रदान करेगी, तुम्हारी दृढ़ता तुम्हें लक्ष्य पर पहुँचा देगी। तुम्हारी निष्ठा तुम्हें दृढ़प्रतिज्ञ भी करेगी तथा तुम्हारी प्रतिज्ञायें तुम्हें सभी प्रकार के भय पर विजय प्रदान करेंगी। मेरा आशीर्वाद तुम पर है; सदैव के लिये है!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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