गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 54)

गुरुदेव ने पुन: कहा

🔵 शब्द कहे जा चुके हैं, उपदेश दिये जा चुके हैं अब कार्य करने की आवश्यकता है। बिना आचरण के उपदेश व्यर्थ हैं।तुमने बहुत पहले ही अपने संकल्पों तथा अन्तर्दृष्टि को आचरण में नहीं लाया। इस बात का तुम्हें कितना दुःख होगा! जब रास्ता मिल गया है तब वीरतापूर्वक बढ़ो। जिसने आत्मसाक्षात्कार का दृढ़ संकल्प कर लिया है उसके मार्ग में कौन बाधा दे सकता है! जब तुम अकेले खड़े होओगे तब ईश्वर तुम्हारा साथी होगा, मित्र होगा, सर्वस्व होगा। ईश्वर के सान्निध्य का और अधिक बोध हो सके इसके लिये अन्य सभी का त्याग करना क्या अधिक अच्छा न होगा? जब तुम प्रकृति का त्याग कर दोगे तब प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य को तुम्हारे सामने प्रगट कर देगी। इस प्रकार तुम्हारे लिये सभी कुछ आध्यात्मिक हो जायेगा। फिर एक घास का तिनका भी तुमसे आत्मा की ही बात कहेगा।  

🔴  जब तुमने सब कुछ त्याग दिया है और एकांत पथ में चले जा रहे हो तब स्मरण रखना कि मेरा प्रेम तथा ज्ञान सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। तुम मेरे निकट, अत्यन्त निकट रहोगे। तुम्हें और अधिक अन्तर्दृष्टि प्राप्त होगी। इच्छाशक्ति के लिये वर्धिष्णु उद्देश्य प्राप्त होगा तथा विश्वबन्धुत्व के भाव का महान विकास होगा। तुम सभी वस्तुओं के साथ एक हो जाओगे।

वत्स, त्याग ही एक पथ है। स्वयं को आज ही मृत कल्पना करो।   

🔵 कितना भी अरुचिकर क्यों न लगे यह निश्चित जान लो कि कभी, चाहे जिस प्रकार हो, आत्मा के लिये शरीर की आहुति देनी होगी। देहात्मबुद्धि को अवश्य जीतना होगा। मंद उत्साह के साथ, दुर्बल निष्ठा के साथ तुम इस लम्बे पथ पर नहीं चल सकते। समय को सामने से पकड़ो। सुविधा का लाभ तुरंत उठा लो। तुम जैसे हो तथा जो होना चाहते हो, इसके बीच की बाधा को यदि तुम एक छलांग में नहीं पार कर सकते हो, तो उसे पार करने में शीघ्रता करो। जैसे एक शेर अपने शिकार पर टूट पड़ता है उसी -प्रकार स्वयं पर टूट पड़ो। अपने मर्त्य स्वरूप पर दया न करो। तब तुम्हारा अमर स्वरूप चमक उठेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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