गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 2)

चित्रगुप्त का परिचय

🔵 नयन्ति नरकं नूनं मात्मानो मानवान् हतः।
दिवं लोकं च ते तुष्टा इत्यूचुर्मन्त्र वेदिनः।।       

-पंचाध्यायी
           
🔴 (नूनं) निश्चय से (हताः) हनन की हुई (आत्मनः) आत्माएँ (मानवान्) मनुष्यों को (नरकं) नरक को (नयन्ति) ले जाती हैं (च) और (तुष्टा) संतुष्ट हुई (ते) वे आत्माएँ (दिव्य लोकं) दिव्य लोक को ले जाती हैं (इति) ऐसा (मंत्र वेदिनः) रहस्य को समझाने वालों ने (प्रोचुः) कहा है।

🔵 उपरोक्त श्लोक में कहा गया है कि हनन की हुई आत्मा नरक को ले जाती है और संतुष्ट की हुई आत्मा दिव्य लोक प्रदान करती है। श्लोक में इस गुत्थी को सुलझा दिया है कि स्वर्ग-नरक किस प्रकार मिलता है? गरुड़ पुराण में इस सम्बन्ध में एक अलंकारिक विवरण दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि यमलोक में ‘चित्रगुप्त’ नामक देवता हर एक जीव के भले-बुरे कर्मों का विवरण प्रत्येक समय लिखते रहते हैं। जब प्राणी मरकर यमलोक में जाता है, तो वह लेखा पेस किया जाता है और उसी के आधार पर शुभ कर्मों के लिए स्वर्ग और दुष्कर्मों के लिए नरक प्रदान किया जाता है।

🔴 साधारण दृष्टि से चित्रगुप्त का अस्तित्व काल्पनिक प्रतीत होता है, क्योंकि पृथ्वी पर अरबों तो मनुष्य ही रहते है, फिर ऐसा ही तथाकथित चौरासी लाख योनियों, जिनमें से अनेक तो मनुष्य जाति से अनेक गुनी अधिक हैं, इन सब की संख्या गिनी जाए, तो इतनी अधिक हो जाएगी कि हमारे अंकगणित की वहाँ तक पहुँच भी न होगी। फिर इतने असंख्य प्राणियों द्वारा पल-पल पर किए जाने वाले कार्यों का लेखा दिन-रात बिना विश्राम के कल्प-कल्पांतों तक लिखते रहना एक देवता के लिए कठिन है। इस प्रकार चित्रगुप्त का कार्य असम्भव प्रतीत होता है, इस कथानक को एक कल्पना मान लेने पर चित्रगुप्त का अस्तित्व भी संदिग्ध हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.1

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