गुरुवार, 12 सितंबर 2019

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (अन्तिम भाग)

आत्मोन्नति के सम्बन्ध में विपरीत वृत्तियाँ आलस्य, प्रमाद अथवा असंयम आदि स्वाध्यायशील व्यक्ति के निकट नहीं जाने पातीं। इसका भी एक वैज्ञानिक हेतु ही है कोई सुरक्षा कवच का प्रभाव नहीं हैं। जिसे पढ़ना है और नित्य नियम से जीवन का ध्येय समझ का पढ़ना है, वह तो हर अवस्था में अपने उस व्रत का पालन करेगा ही। अव्यवस्था अथवा अनियमितता, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, अस्तु वह जीवन की एक सुनिश्चित दिनचर्या बनाकर चलता है। उसका सोना, जागना, खाना-पीना टहलना-घूमना और कार्य करने के साथ-साथ पढ़ने-लिखने का कार्यक्रम एक व्यवस्थित रूप में बड़े अच्छे ढंग से चला करता है। जिसने जीवन के क्षणों को इस प्रकार उपयोगिता पूर्वक नियम-बद्ध कर दिया है, उसका तो एक-एक क्षण तपस्या का ही समय माना जायेगा। जिसने जीवन में व्यवस्था एवं नियम बद्धता का अभ्यास कर लिया, उसने मानो अपने आत्म लक्ष्य के लिये एक सुन्दर नसेनी तैयार कर ली है, जिसके द्वारा वह सहज ही में ध्येय तक जा पहुँचेगा।

अनुभव सिद्ध विद्वानों ने स्वाध्याय को मनुष्य का पथ प्रदर्शक नेता और मित्र जैसा हितैषी बताया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति सत्पथ-प्रदर्शक बताया है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल विवेकानंद और बुद्धि कुण्ठित रहती है। इन समस्याओं के कारण उसे दुःखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ता। इसीलिये तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य को यही अन्तिम उपदेश दिया करता था--

“स्वाध्यायात् मा प्रमद।”
अर्थात्- हे प्यारे शिष्य! अपने भावी जीवन में स्वाध्याय द्वारा योग्यता बढ़ाने में प्रमाद मत करना।
स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता ही है, साथ ही उस न कोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नई पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।

स्वाध्याय जीवन विकास के लिये एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरी करना चाहिये। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमादवश पढ़-लिख नहीं पाते और जब आगे चल कर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है।

किन्तु इसमें पछताने की बात होते हुए भी अधिक चिन्ता की बात नहीं है। ऐसे लोग जो स्वयं पढ़-लिख नहीं सकते, उन्हें विद्वानों का सत्संग करके और दूसरों द्वारा सद्ग्रन्थों को पढ़वाकर सुनने अथवा उनके प्रवचन का लाभ उठाकर अपनी इस कमी की पूर्ति करते रहना चाहिये। जिनके घर पढ़े-लिखे बेटी-बेटे अथवा नाती-पोते हों, उन्हें चाहिये कि वे सन्ध्या समय उनको अपने पास बिठा कर सद्ग्रन्थों का अध्ययन करने का अभ्यास हो जायेगा। जहाँ चाह, वहाँ राह-के सिद्धान्त के अनुसार यदि स्वाध्याय में रुचि है और उसके महत्व का हृदयंगम कर लिया गया है तो शिक्षा अथवा अशिक्षा का कोई व्यवधान नहीं आता, स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/March/v1.24

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