शनिवार, 24 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 44) 25 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 सास बहुओं में, ननद भौजाइयों में, देवरानी जिठानियों, में अक्सर छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई हुआ करती है। स्त्री जाति को मानसिक विकास के अवसर प्रायः कम ही उपलब्ध होते हैं इसलिए उनकी उदारता संकुचित होती है। निस्संदेह पुरुष की अपेक्षा आत्म-त्याग और स्नेह की मात्रा स्त्रियों में बहुत अधिक होती है पर वह अपने बच्चे या पति में अत्यधिक लग जाने के कारण दूसरों के लिए कम बचती है।

🔴 समझा-बुझाकर, एक दूसरे के उदारता प्रकट करने का अवसर देकर, उन्हें यह अनुभव करना चाहिए कि परिवार के सब सदस्य बिलकुल निकटस्थ, बिलकुल सगे हैं। विरानेपन या परायेपन की दृष्टि से सोचने की दुर्भावना को हटाकर आत्मीयता की दृष्टि से सोचने योग्य उनकी मनोभूमि को तैयार करना चाहिये। बड़े बूढ़े यह आशा न करें कि हमारे साथ शिष्टाचार की अति बरती जानी चाहिये, उन्हें छोटों के प्रति क्षमा, उदारता, प्रेम और और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिये। दास, नौकर या गुलाम जैसा नहीं।

🔵 इसी प्रकार छोटों को बड़ों के प्रति आदर-भाव रखना चाहिये, घर के अन्य कामों की अपेक्षा पहिले आवश्यकता और इच्छाओं को पूरा करना चाहिये। घर का काम धंधा आमतौर से बंटा हुआ रहना चाहिये। बीमारी, कमजोरी, गर्भावस्था या अन्य किसी कठिनाई की दशा में दूसरों को उसका काम आपस में बांटकर उसे हलका कर देना चाहिये। नित्य पहनने के जेवरों को छोड़कर अन्य जेवर सम्मिलित रखे जा सकते हैं जिनका आवश्यकतानुसार सब उपयोग कर लें। आपको यदि पैसे की सुविधा हो तो सबके लिये अलग-अलग जेवर भी बन सकते हैं पर वे सब के पास करीब करीब समान होने चाहिये। नई शादी होकर आने वाली बहू के लिये अपेक्षाकृत कुछ अधिक चीजें होना स्वाभाविक है। विशेष अवस्था को छोड़कर साधारणतः सबका भोजन वस्त्र करीब करीब एक सा ही होना चाहिये। इस प्रकार स्त्रियों में एकता रह सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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