रविवार, 5 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 7)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 ऊँची सतह के बड़े तालाब में अधिक पानी होता है। पास में ही कोई कम पानी वाला गड्ढा हो तो दोनों की तुलना में असाधारण अंतर होगा। इतने पर भी यदि दोनों के बीच एक नाली बना दी जाए तो ऊँचे तालाब का पानी नीचे गड्ढे को भरना जल्दी आरंभ कर देगा और वह सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक कि दोनों जलाशय एक सतह पर नहीं आ जाते। नीचे वाले गड्ढे का पानी निश्चित रूप से ऊँचा उठेगा; भले ही इसमें ऊँचे वाले को कुछ घाटा ही क्यों न रहा हो।

🔴 ईश्वर-सान्निध्य के लिये किये गये प्रयास अंधविश्वास नहीं है। यदि उनका सही तरीका न समझ सके तो मृगतृष्णा में भटकने वाले हिरण की तरह भ्रमग्रस्तों जैसी धमाचौकड़ी मचाते रहेंगे। तब तो खिन्नता, विपन्नता और असफलताएँ ही हाथ लगेंगी। यदि रुके बिना धीरे-धीरे चलने वाली चींटी भी पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है तो फिर कोई कारण नहीं कि ईश्वर-सान्निध्य का सही मार्ग विदित हो जाने पर उस प्रयोजन में आश्चर्यजनक सफलता न मिल सके।          

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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