रविवार, 5 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 29)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 जो विचार देर तक मस्तिष्क में बना रहता है, वह अपना एक स्थायी स्थान बना लेता है। यही स्थायी विचार मनुष्य का संस्कार बन जाता है। संस्कारों का मानव-जीवन में बहुत महत्व है। सामान्य-विचार कार्यान्वित करने के लिए मनुष्य को स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है, किन्तु सरकार उसको यन्त्रवत् संचालित कर देता है। शरीर-यन्त्र जिनके द्वारा सारी क्रियायें सम्पादित होती हैं, सामान्य विचारों के अधीन नहीं होता।

🔵 इसके विपरीत इस पर संस्कारों का पूर्ण आधिपत्य होता है। न चाहते हुए भी, शरीर-यन्त्र संस्कारों की प्रेरणा से हठात् सक्रिय हो उठता है और तदनुसार आचरण प्रतिपादित करता है। मानव जीवन में संस्कारों का बहुत महत्व है। इन्हें यदि मानव-जीवन का अधिष्ठाता और आचरण का प्रेरक कह दिया जाय तब भी असंगत न होगा।

🔴 केवल विचार मात्र ही मानव चरित्र के प्रकाशक प्रतीत नहीं होते। मनुष्य का चरित्र विचार और आचार दोनों से मिलकर बनता है। संसार में बहुत से ऐसे लोग पाये जा सकते हैं, जिनके विचार बड़े उदात्त महान् और आदर्श पूर्ण होते हैं, किन्तु उनकी क्रियायें उसके अनुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हों और कर्म अपावन तो यह सच्चरित्रता नहीं होती।

🔵 इसी प्रकार बहुत से लोग ऊपर से बड़े ही सत्यवादी, आदर्शवादी और धर्म-कर्म वाले दीखते हैं, किन्तु उनके भीतर कलुषपूर्ण विचारधारा बहती रहती है। ऐसे व्यक्ति भी सच्चे चरित्र वाले नहीं माने जा सकते। सच्चा चरित्रवान् वही माना जायेगा और वास्तव में वही होता है जो विचार और आचार दोनों को समान रूप से उच्च और पुनीत रखकर चलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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