मंगलवार, 7 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 9)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 इस संदर्भ में एक और भी बढ़ी मूर्खता जनसाधारण के मन में गहरी जड़ें जमाकर बैठ गई है कि ईश्वर में सिद्धांत-रहित किसी ऐसे भूत-प्रेत की कल्पना समाविष्ट कर ली गई जो निशिदिन उपहार बटोरते और नाक रगड़ते हुए भक्तजनों के पीछे रहता है; साथ ही पूजा-पाठ की छुट-पुट टण्ट-घण्ट कर देने भर से फूलकर कुप्पा हो जाता है और मनचाहे उपहार-वरदान बाँटकर हर किसी की मनोकामनाएँ पूरी करता है; भले ही वे कितनी ही अनावश्यक या अनुचित क्यों न हों। 

🔴 इसके अतिरिक्त इस परमेश्वर में एक और भी बुरी आदत है कि पूजा-पत्री में कोई छोटी-मोटी गलती हो जाए तो भी वह आगबबूला हो जाता है और कल तक जिसे भक्त मानता था, आज उसकी जान लेने तक को तैयार हो जाता है। राजी होने के लिये बढ़े-चढ़े उपहार माँगता है। अपना भक्त किसी दूसरे देवता की पूजा करने लगे तो उसकी भी अच्छी-खासी खबर लेता है।

🔵 यही है आज का सशक्त परमेश्वर जिसे जातियों, वर्गों, कबीलों और मत-मतांतरों वाले लोग अपने-अपने तरीके से खोजते और अपनी-अपनी मान्यता के अनुरूप नाम व रूप देेते हैं। इस कालभैरव से किसी का क्या भला होता है, इसे तो पूजने वाले ही जानें, पर एक बात निश्चित है कि इन स्वयंभू देवी-देवताओं के स्वयंभू एजेन्टों की पाँचों उँगलियाँ हर घड़ी घी में रहती हैं। वे मनोकामना पूरी कराने अथवा गरीबी दूर करने-कराने के बहाने हर स्थिति में अपनी एजेण्टी का धंधा बढ़ाते चलते रहे हैं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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