मंगलवार, 7 मार्च 2017

👉 फूल एक सजीव सौंदर्य

🔴 दार्शनिक अरस्तु को फूलों से बड़ा प्रेम था। उन्हें जितना अवकाश का समय मिलता था, उस समय का संपूर्ण उपयोग फूलों को रोपने, उनकी क्यारियों में जल भरने, निकाई करने गोडाइ करने मे करते थे। उनकी छोटी-सी बगीची उसमें नाना प्रकार के हरे, नीले, पीले, लाल, गुलाबी फूल झूमते रहते थे। गर्मियों में भी पास से गुजरने वाले लोगों को हरियाली और सुगंध का लाभ मिलता था। दोनों वस्तुएँ ऐसी है, जिन्हें देखते ही आत्मा खिल उठती है, मन प्रफुल्लित हो उठता है।

🔵 एक दिन एक मित्र ने पूछा- "आपको फूलों से इतना प्रेम क्यों है" तो उन्होंने मुस्कराकर कहा- यों कि फूल परमात्मा का सौंदर्यबोध कराता है। फूलों को देखकर मानव सात्विक, सरल व सुरुचि भाव जाग्रत करता है। अंतःकरण की जो कोमल वृत्तियाँ हैं, फूलों के सान्निध्य और दर्शन से उनका विकास होता है। इसीलिए तो लोग देवालयों में जाकर फूल चढाते हैं कि उनकी कोमल भावनाएँ परमात्मा स्वीकार करे और स्नेह आशीर्वाद प्रदान करे।

🔴 बडे़ आदमियों, गुरुजनों से भेंट के समय विदाई और मिलन समारोहों में पुष्पहार पहनाना, गुलदस्ते भेंट करने के पीछे भी यही मनोविज्ञान है, उससे हम अपनों मे बडो़ के स्नेह का अधिकार प्राप्त करते है।

🔵 विदेशो में फुलबाड़ी लगाने में लोग बहुत रुचि प्रदर्शित करते हैं, बहुत धन खर्चते हैं और अच्छे-अच्छे फूलों की नस्लें, किस्में प्राप्त करने के लिये परिश्रम भी करते हैं। खेद है कि धार्मिक वृत्ति का देश होते हुए भी अब अपने देश में फूल लगाने की रुचि उतनी नहीं रही। प्रतिदिन उपासना, देव-प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और पुष्पार्पण के लिए फूलों की आवश्यकता होती है, शुचिता, स्वच्छता आदि की तरह फूलों को उपासना का अविछिन्न अंग ही माना गया है, इस संबंध में पद्मपुराण के क्रियायोग के प्राय: ८९ और २८० वें अध्यायों में संपूर्ण रूप से फूलों की उपयोगिता का भी विवेचन हुआ है। लिखा है-

चैत्रे तु चम्पकेनैव जातिपुष्पेण वापुन:।
पूजनीय: प्रयत्नेन केशव: क्लेशनाशन:।।
वैसाखे तु सदा देवि ह्यर्चनीयो महाप्रभुः।
केतकी पत्रमादाय वृषस्थे च दिवाकरे।।

🔴 चैत्र में कमलपुष्प, जाति पुष्प, चंपा दौना, कटसरैया, वरुण पुष्प; बैसाख में केतकी, ज्येष्ठ मे यही पुष्प: आषाढ में कनेर (करवीर), कदंब तथा कमल पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।

🔵 यह संदर्भ तत्कालीन लोगों में फूलों की अभिरुचि व्यक्त करते है। यद्यपि तब विविध पुष्पों की उपज माली करते थे। अब मालियों के पास न तो वैसे साधन- सुविधाएँ हैं और न रुचि इसलिए फूलों की आवश्यकता की पूर्ति हर गृहस्थ को स्वयं करनी चाहिए।

🔴 घरों के आस-पास काफी जमीन बेकार पडी रहती है उनकी क्यारियाँ बनाकर स्थायी और कुछ समय फूल देने वाले पौधे रोपे जा सकते हैं। जहाँ भूमि का अभाव है, वहाँ सजाकर रखे जा सकते हैं। थोडा भी समय देकर उनकी सिंचाई आदि की व्यवस्था की जा सके तो हर घर में आवश्यकता अनुरूप फूल उपजाए जा सकते है। कुछ लोग बडे पैमाने खेती भी कर सकते हैं।

🔵 उपासना की आवश्यकता की पूर्ति के साथ ही इस अभिरुचि से आस-पास के वातावरण में सौंदर्य का विकास होता है। फूलों से दृश्य मनोरम हो जाता है। जहाँ फूल होते हैं समझा जाता है कि यहाँ सुसंस्कृत और विचारवान् लोग निवास करते है। किसी भी दृष्टि से फूलों की अभिरुचि मनुष्य को प्रसन्नतादायक ही होती है। हमें एक नये सिरे से पुष्प उत्पादन का अभियान प्रारंभ करना चाहिए। स्वयं फूल उगाऐ उपासना के समय प्रयोग करें दूसरों को स्नेह के आदान-प्रदान के रूप दिया करें। बीज और पौधों का वितरण करके भी फूल अभियान को सफल बनाया जा सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 69, 70

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