मंगलवार, 7 मार्च 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 13)

🌹 द्विज का अर्थ - मर्म समझें

🔴 अपने हिन्दू समाज में जिन मनुष्यों के दो बार जन्म होते हैं। उन्हें द्विज कहते हैं। द्विज माने दुबारा जन्म लेने वाला। दुबारा जन्म क्या है? नर- पशु के जीवन से नर- नारायण के जीवन की भूमिका में प्रवेश करना। यही तो दूसरा जन्म है और ये दूसरा जन्म जिस दिन लिया जाता है, जिस दिन ये प्रतिज्ञाएँ ली जाती हैं, उस दिन एक समारोह मनाया जाता है, उत्सव मनाया जाता है, कर्मकाण्ड किया जाता है। उसी का नाम दीक्षा संस्कार है। जो आदमी इस तरह की प्रतिज्ञा के लिए तैयार नहीं होते हैं और वे कहते हैं कि ऊँचे जीवन और आदर्श जीवन से कोई मतलब नहीं रखते हैं, वे कहते हैं कि हम तो केवल पशुओं की तरह से जीवन जियेंगे।

🔵 हम पेट भरने के लिए जीयेंगे और संतान पैदा करने के लिए जीयेंगे, उनको अपने यहाँ शूद्र कहा गया और शूद्रों को बहिष्कृत माना गया है। इस तरीके से शूद्र वे नहीं हैं, जो किसी जन्म में, किसी कौम में पैदा होते हैं। शूद्र वे हैं, जिनके जीवन में जीवन का कोई लक्ष्य नहीं होता है और जिनका पशुओं की तरह पेट पालना और रोटी कमाना ही लक्ष्य है। वे सब के सब आदमी शूद्र हैं, दूसरे शब्दों में पशु कहें, तो भी कोई हर्ज नहीं है। उसको बहिष्कृत माने जाने की परम्परा उस जमाने में उसी तरह की थी। 

🔴 आज तो जन्म से शूद्र और जन्म से ही ब्राह्मण मानते हैं। जन्म से शूद्र वर्ण का कोई मतलब नहीं है। केवल मतलब ये है कि जो आदमी भौतिक जीवन जीते हैं और आत्मिक जीवन के प्रति जिनका कोई लगाव नहीं है, उन आदमियों का नाम नर- पशु अथवा शूद्र। शूद्र अपने यहाँ एक निंदा की बात थी, किसी जमाने में, कर्म के आधार पर जब शूद्र और ब्राह्मण बनते थे तब। आज जब जन्म के आधार पर शूद्र और ब्राह्मण मान लिया जाने लगा, तब कोई निंदा की बात नहीं रही और न ही कोई अपमान की बात रही।

🔵 अब तो सब गुड़- गोबर ही हो गया, लेकिन पुराने जमाने की बात अलग थी। मनुष्य शूद्रता की सीमा से निकल करके जिस दिन ये प्रतिज्ञा लेता है, व्रत लेता है कि मैं आज से मनुष्य होकर के जिऊँगा; उस दिन का समारोह? आत्मा और परमात्मा के साथ मिलने का विवाह जैसा समारोह होता है। उस दिन को मनुष्य जीवन में प्रवेश करने वाला नया जन्म कह लीजिए, उसे आत्मा का परमात्मा के साथ आध्यात्मिक विवाह कह लीजिए।    
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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