सोमवार, 6 मार्च 2017

👉 पति की नाव पत्नी ने खेई

🔵 श्री जगदीश चंद्र बसु कलकत्ता यूनिवर्सिटी में विज्ञान के अध्यापक नियुक्त किए गए। अभी तक ऐसा सम्मान किसी भी भारतीय को उपलब्ध नहीं हुआ था। इसलिए श्री जगदीशचंद्र बसु को भारतीय बडा भाग्यशाली मानते थे।

🔴 कुछ दिन पीछे पदोन्नति का समय आया। श्री बसु को पदोन्नत कर दिया गया, पर अब वे जिस पद पर पहुँचे, उस पर पहले से काम कर रहे अंग्रेज पदाधिकारी की अपेक्षा उन्हें वेतन कम दिया गया। जहाँ अन्य संबंधियों ने उन्हें इस बात की उपेक्षा करने की सलाह दी वहीं श्री जगदीश चंद्र बसु ने इसे अपने स्वाभिमान पर आघात माना और तब तक वेतन लेने से इनकार कर दिया जब तक कि उनका स्वयं का वेतन अंग्रेज पदाधिकारी के बराबर नहीं कर दिया जाता। इस तरह का सत्याग्रह करते हुये भी अध्यापन कार्य नहीं छोड़ा। आजीविका का स्रोत बंद हो जाने के कारण घर-खर्च की तंगी आ गई। उनकी धर्म पत्नी ने ऐसे गाढ़े समय पति के स्वाभिमान को चोट न आने देने व उनको किसी प्रकार कष्ट न होने देने में पूर्ण तत्परता बरती।

🔵 उन दिनो में हुगली नदी पर पुल नहीं बना था। कालेज जाने के मार्ग में हुगली पडती थी, उसे पार करने में आठ आने देने पडते थे। इस तरह के कई अनावश्यक खर्च जिन्हें उनकी धर्म पत्नी ने बचा लिया, पर इस खर्च को रोक सकना कठिन था।

🔴 कोई उपाय नहीं सूझ रहा था, तब श्रीमती अवला वसु ने अपने एक मांगलिक आभूषण को बाजार में बेचकर एक छोटी नाव खरीद ली। उस दिन से वह स्वयं नदी तक उनके साथ जाती। नाव में बैठकर पार पहुँचा आती और वापसी घर अपना काम-काज करती। सांयकाल फिर ठीक समय वे नाव लेकर पहुंच जाती और श्री बसु को उसमें बैठाकर साथ लेकर आती। सरकार को इस बात का पता चला तो उसने यह लिखते हुए-"जिसकी ऐसी निष्ठावान् पत्नी हो उसका वेतन नहीं रोका जा सकता।" उनका वेतन अंग्रेज पदाधिकारी के बराबर कर दिया और अपनी पराजय मान ली।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 67, 68

1 टिप्पणी:

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