सोमवार, 6 मार्च 2017

👉 वास्तविक अध्यात्म क्या है?

🔴 किसी भी व्यक्ति की आत्मिक प्रगति कितनी हुई, इसका निर्धारण उसके कथन-पठन-श्रवण-भजन की बहिरंग क्रिया-प्रक्रिया के आधार पर नहीं किया जा सकता। इन उपचारों को कोई भी विद्याव्यसनी या कौतुकी भी करता रह सकता है। व्यक्तित्व की गरिमा का मूल्यांकन करने के लिए दो प्रकार की जाँच करनी पड़ती है। एक है व्यक्तिगत ललक लिप्साओं में, महत्त्वकांक्षाओं में कटौती। इसी को संयम-साधना या तपश्चर्या कहते हैं। दूसरी है न्यूनतम में निर्वाह के उपरान्त बची हुई श्रम, क्षमता, बुद्धि, सम्पदा और साधन-सामग्री को सत्प्रवृत्ति, संवर्धन के लिए नियोजित करने की ललक-लगन व निष्ठा भरी तत्परता। अन्तःकरण के स्तर को उदात्त बनाने में इससे कम में काम चल ही नहीं सकता। इतना बन पड़े तो फिर अन्य उपचारों की आवश्यकता शोभा-सज्जा जितनी भर रह जाती है।

🔵 अध्यात्म एक उच्चस्तरीय पुरुषार्थ है, मात्र उपचार नहीं, जिसमें क्रिया-कृत्यों के आधार पर समय क्षेप करने पर, कर्मकाण्ड आदि करने पर कुछ उपलब्धियाँ हस्तगत होती बतायी जाती हैं। ये कर्मकाण्ड तो एक प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव है, जिनके कारण दृष्टिकोण बदलने, आदतें सुधारने के आधार पर चेतना को अधिकाधिक परिष्कृत बनने का अवसर मिलता है। जो लोग पूजा पत्री की लकीर भर पीटते रहते हैं, वे भीतर से निराशा एवं मन में नास्तिकता ही संजोये रहते हैं। कुछ कहने योग्य हाथ नहीं लगता एवं व्यक्तित्व के परिमापन के रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है कि वस्तुतः अध्यात्म इनके जीवन में उतरा नहीं।

🔴 यह समझा जाना चाहिए कि वास्तविक अध्यात्म जब आन्तरिक सफलताओं का पथ प्रशस्त करता है, तो साधक को सम्पन्न नहीं, सुसंस्कृत बनाता है। सम्पत्तिपरक वैभव का भार घटता है और उच्चस्तरीय पराक्रम उभरता है। इतिहास साक्षी है कि आत्मचेतना के विकास ने किसी को सम्पन्न नहीं बनाया वरन् समृद्धि को आदर्शों के लिए समर्पित करने एवं स्वयं हल्का-फुल्का रहने के लिए बाधित किया है।

🔵 महामानवों ने सदा से ही गरीबी का स्वेच्छा से वरण किया है और सञ्चित वैभव का उदारतापूर्वक उस प्रयोजन के निमित्त समर्पण किया है। वास्तविक अध्यात्म यही है जो महत्वाकांक्षाओं की लिप्साओं की कटौती करना सिखाता है, जिससे लोक मंगल की भगवद् उपासना करने के लिए अपना सब कुछ नियोजित हो सके। यह मर्म समझ में आ जाने पर यथार्थता की सम्पदा पा लेने पर, आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने में किसी को संशय नहीं करना चाहिए।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 21

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