सोमवार, 6 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 30)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 चरित्र मनुष्य की सर्वोपरि सम्पत्ति है। विचारकों का कहना है—‘‘धन चला गया, कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, कुछ चला गया। किन्तु यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया।’’ विचारकों का यह कथन शतप्रतिशत भाव से अक्षरशः सत्य है। गया हुआ धन वापस आ जाता है। नित्य प्रति संसार में लोग धनी से निर्धन और निर्धन से धनवान् होते रहते हैं। धूप-छांव जैसी धन अथवा अधन की इस स्थिति का जरा भी महत्व नहीं है।

🔵 इसी प्रकार रोगों व्याधियों और चिन्ताओं के प्रभाव में लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ता और तदनुकूल उपायों द्वारा बनता रहता है। नित्य प्रति अस्वास्थ्य के बाद लोग स्वस्थ होते देखे जा सकते हैं। किन्तु गया हुआ चरित्र दुबारा वापस नहीं मिलता। ऐसी बात नहीं कि गिरे हुए चरित्र के लोग अपना परिष्कार नहीं कर सकते। दुष्चरित्र व्यक्ति भी सदाचार, सद्विचार और सत्संग द्वारा चरित्रवान बन सकता है। तथापि वह अपना वह असंदिग्ध विश्वास नहीं पा पाता, चरित्रहीनता के कारण जिसे वह खो चुका है।

🔴 समाज जिसके ऊपर विश्वास नहीं करता, लोग जिसे सन्देह और शंका की दृष्टि से देखते हों, चरित्रवान् होने पर भी उसके चरित्र का कोई मूल्य, महत्त्व नहीं है। वह अपनी निज की दृष्टि में भले ही चरित्रवान् बना रहे। यथार्थ में चरित्रवान् वही है, जो अपने समाज, अपनी आत्मा और अपने परमात्मा की दृष्टि में समान रूप से असंदिग्ध और सन्देह रहित हो। इस प्रकार की मान्य और निःशंक चरित्रमत्ता ही वह आध्यात्मिक स्थिति है, जिसके आधार पर सम्मान, सुख, सफलता और आत्मशान्ति का लाभ होता है। मनुष्य को अपनी चारित्रिक महानता की अवश्य रक्षा करनी चाहिए। यदि चरित्र चला गया तो मानो मानव-जीवन का सब कुछ चला गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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