सोमवार, 6 मार्च 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 12)

🌹 निर्मल-उदात्त जीवन की ओर

🔴 ये जो दो कदम हैं- आत्मा की उन्नति के और मनुष्य जीवन को सफल बनाने के, जिनको मैंने अभी- अभी आपको निर्मल जीवन जीना कहा, उदार जीवन जीना कहा- वह साधना है। साधना निश्चित होती है। उपासना एक छोटा- सा अंग है। जो पूजा की कोठरी में दस- बीस मिनट बैठकर की जा सकती है, लेकिन उपासना तो बीज हुआ। बीज तो थोड़ी देर ही बोया जाता है, पर खेती तो साल भर की जाती है। जो पूजा- पाठ दस- पाँच मिनट किया गया है, उस पूजा- पाठ को सारे जीवन भर चौबीस घंटे अपने जीवन को निर्मल बनाने और परिष्कृत बनाने में खर्च किया जाना चाहिए। यही तो उपासना है, यही तो साधना है।

🔴  इस तरह का साधनात्मक जीवन जीने की प्रतिज्ञा जिस दिन ली जाती है। वह दिन ही दीक्षा दिवस होता है। जब मनुष्य अपने उद्देश्य के बारे में खबरदार हो जाता है, सावधान हो जाता है और ये ख्याल करता कि मैं दूसरे लोगों के तरीके से दुनिया के आकर्षणों में, प्रलोभनों में और भ्रमों में फँसने वाला नहीं हूँ,  मैं ऊँचा जीवन जिऊँगा, ऊँचा जीवन जीने के लिए गतिविधियाँ बनाऊँगा, कार्यक्रम बनाऊँगा, योजना बनाऊँगा, जिस दिन वह आदमी संकल्प करता है, समझना चाहिए कि उस दिन उसकी दीक्षा हो गई। उस दिन वह भगवान् से जुड़ गया और अपने उद्देश्यों के साथ में जुड़ गया और महानता के साथ जुड़ गया और जीवन की सफलता की मंजिल प्रारम्भ हो गयी। इस तरह का श्रेष्ठ जीवन और इस तरह का व्रत जिस दिन लिया गया है, समझना चाहिए कि उसी दिन आदमी का नया जन्म हो गया। ये नया जन्म है।    
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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