सोमवार, 6 मार्च 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 14)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं  

🔴 हनुमान, सुग्रीव के सुरक्षा कर्मचारी थे। भयभीत सुग्रीव के लिए दो वन आगन्तुकों का भेद लेने के लिए वे वेष बदलकर राम-लक्ष्मण के पास गए थे और सिर नवाकर विनम्रतापूर्वक पूछ-ताछ कर रहे थे। पर बाद में स्थिति बदली, सीता की खोज के लिए राम को हनुमान की जरूरत पड़ी। अनुरोध उन्होंने स्वीकारा तो बदले में इतनी सामर्थ्य के धनी बन गए, जो उनकी मौलिक विशेषताओं में सम्मिलित नहीं थी। समुद्र छलांगने, लङ्का को जलाने, पर्वत उखाड़कर लाने जैसे असाधारण काम थे, जो उन्होंने अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करके सम्पन्न किये।             

🔵 ईश्वर के लिए आड़े समय में काम आने वाले को भी ऐसे ही उपहार-अनुदान मिलते हैं। विभीषण को लङ्का का सम्राट् बनने का सुयोग मिला। सुग्रीव ने अपना खोया राज्य पाया। भगवान के काम के लिए देवपुत्र माँगने वाली कुन्ती को उत्कृष्ट स्तर के पुत्र रत्न देने में उन्होंने आना-कानी नहीं की। भक्ति का प्रचार करने वाले नारद देवर्षि कहलाए। सूर-तुलसी ने ईश्वर के काम के लिए प्रतिज्ञारत होकर ऐसी प्रतिभा पाई, जिसके सहारे वे अनन्त कीर्ति पा सकने के अधिकारी बने।   

🔴 इन दिनों स्रष्टा ने ही विश्व-कल्याण के लिए, नवसृजन के लिए कर्मवीरों को पुकारा है। जो उस हेतु हाथ बढ़ाएँगे, वे खाली क्यों रहेंगे? भगीरथ, गाँधी, बुद्ध आदि को जो समर्थता मिली, वह इसलिए मिली कि परमार्थ प्रयोजन के काम आए।

🔵 इस दुनियाँ में ऐसी भी सुविधा है कि जब-तब बहुत-सी उपयोगी वस्तुएँ बिना मूल्य भी मिल जाती हैं। हवा, पानी, छाया, खुशबू आदि हम बिना मूल्य ही पाते हैं; पर जौहरी या हलवाई की दुकान पर सुसज्जित रखी हुई वस्तुएँ उठाकर चल देने का कोई नियम नहीं है। उनका मूल्य चुकाना पड़ता है। गाय को घास न खिलाई जाए, तो दूध प्राप्त करते रहना कठिन है।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

1 टिप्पणी:

👉 रास्ते की बाधा....

🔴 बहुत पुराने समय की बात है एक राज्य के राजा ने अपने राज्य के मुख्य दरवार पर एक बड़ा सा पत्थर रखवा दिया इस पत्थर के रखवाने का मुख्य कारण...