शनिवार, 4 मार्च 2017

👉 सबका आदर सच्ची सभ्यता

🔴 राष्ट्रपति का घोड़ा शान के साथ आगे-आगे चल रहा था। पीछे कुछ साथी थे और बाद में अंगरक्षक घुडसवार। यह कोई राजकीय यात्रा न थी। मन बहलाव के लिये निकले थे सब लोग।

🔵 सडक पर बढ़ते हुए राष्ट्रपति को एक हबशी मिला हबशी ने राष्टाध्यक्ष को पहचाना उसने अपनी टोपी उतारी और झुककर प्रणाम किया फिर राष्ट्रपति ने भी अपनी टोपी उतारी और सिर झुकाकर अभिवादन का उत्तर अभिवादन से दिया। हबशी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा, खुशी-खुशी एक ओर निकलकर अपने घर चला गया।

🔴 कुछ नजदीकी मित्र और संबंधी थे, राष्ट्रपति का प्रत्युत्तर में झुककर प्रणाम करना उन्हें अच्छा न लगा। इतने बडे राष्ट्र का स्वामी एक मामूली हबशी को विनम्र अभिवादन करे, इसमे कुछ शान का घटियापन लगा बेचारे बोल कुछ न सकते थे। सबके सब पीछे-पीछे चलते और मनोविनोद करते गये।

🔵 शाम को घर लौटे अतिथियों सहित सब लोग भोजन पर बैठे तो एक मित्र ने दिन वाला प्रसंग छेड दिया और कहा कहाँ उनकी यह संभ्रात स्थिति कहाँ वह गुलाम हबशी-आपको उसे मस्तक झुकाकर अभिवादन नहीं करना चाहिए था। वह एक साधारण व्यक्ति था। इसलिये उसे विनम्र होना अनिवार्य था आपके लिये नहीं राष्ट्रपति हँसे और बोले-ठीक कहते हो भाई राष्ट्रपति तो बहुत बडा़ आदमी होता है लेकिन क्या उसे बेअदब भी होना चाहिए 'राष्ट्रपति तो मैं इसलिये हूँ कि मुझमें शासन सत्ता संभालने की योग्यता अनुभव की गई है, पर यदि अपना राष्ट्रपति पद और उस व्यक्ति का हबशी कहा जाना दोनों निकाल दें तो फिर हम दोनों एक ही सामान्य श्रेणी के मनुष्य रह जाते है प्रत्येक मनुष्य रह जाते हैं। प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य का आदर करे। भाइयो यही तो सच्ची सभ्यता है। पद-प्रतिष्ठा और उच्च सम्मान पाने का यह तो अर्थ नहीं है कि लोग मानवीय कर्तव्यों की अवहेलना करने लगें। उसने जिस आत्मीयता और सम्मान के साथ प्रणाम किया था, वैसे मैं न करता तो यह मानवता का अपमान न होता ?

🔴 मित्रों को उनकी बात के आगे कोई दलील सूझ न पडी़ तो भी अपने पक्ष की पुष्टि ले लिए उन्होनें इस बार राष्ट्रपति के परिवार वालों का समर्थन पाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कुछ हो आप जैसे विद्वान और प्रतिष्ठित व्यक्ति को वैसा नहीं करना चाहिए।

🔵 राष्ट्रपति की धर्मपत्नी भी वहीं उपस्थित थी। उन्होंने कहा जॉर्ज साहब ने जो कुछ भी किया। वह आदर्श ही नहीं, अनुकरणीय भी है मनुष्य-मत्रुष्य में परस्पर भेद-भाव न रहे इसके लिये यह आवश्यक है कि ऊँची या नीची परिस्थितियों में रहते हुए भी आत्म-समानता का ध्यान रखा जाए। एक दिन था जब हम लोग निर्धन थे, सामान्य श्रेणी में गिने जाते थे। आज इस स्थिति में हैं, इसका यह तो अर्थ नहीं कि हम मनुष्य नहीं रह गये। मनुष्य के नाते इन्होंने जो कुछ किया, वही सही था। एक अनपढ व्यक्ति ने झुककर प्रणाम किया यह उसकी सभ्यता थी और यदि पढ़े-लिखे होकर भी ये वैसा प्रत्युत्तर न देते तो इससे बडी असभ्यता प्रकट होती।'' यह सुनकर सब उनसे सहमत हो गये।

🔴 यह राष्ट्रपति अमेरिका के निर्माता जार्ज वाशिंगटन थे।

🔵 प्रत्येक मनुष्य अपनी अच्छी-बुरी स्थिति का अच्छा-बुरा परिणाम पाता है, इसको मापदंड मानकर सभ्यता नही छोडी जा सकती है। ऊँच-नीच का भेदभाव न रखकर हर मनुष्य को सम्मान देना ही सच्ची सभ्यता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 63, 64

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