बुधवार, 8 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 72)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 पूजा उपासना के बिना आत्मिक प्रगति कैसे हो सकती है। यह जानने के साथ- साथ हमें यह भी जानना चाहिए कि स्वास्थ्य, अध्ययन, चिन्तन, मनन की, बौद्धिक विकास की प्रक्रिया सम्पन्न किये बिना केवल कलम कागज के आधार पर लेख नहीं लिखा जा सकता। न कविताएँ बनाई जा सकती हैं। आन्तरिक उत्कृष्टता बौद्धिक विकास की तरह है और पूजा अच्छी कलम की तरह। दोनों का समन्वय होने से ही बात बनती है। एक को हटा दिया जाय तो बात अधूरी रह जाती है। हमने यह ध्यान रखा कि साधना की गाड़ी एक पहिए पर न चल सकेगी, इसलिए दोनों पहियों की व्यवस्था ठीक तरह  जुटाई जाय।   

🔵 हमने उपासना कैसे कि इसमें कोई रहस्य नहीं है। गायत्री महाविज्ञान में जैसा लिखा है उसी क्रम से हमारा गायत्री मन्त्र का सामान्य उपासन क्रम चलता रहा है। हाँ! जितनी देर तक भजन करने बैठे हैं, उतनी देर तक यह भावना अवश्य करते रहे हैं ब्रह्म की परम तेजोमयी सत्ता माता गायत्री का दिव्य प्रकाश हमारे रोम- रोम में ओत- प्रोत हो रहा है और प्रचण्ड अग्नि में पड़कर लाल हुए लोहे की तरह हमारा भौंड़ा अस्तित्व उसी स्तर का उत्कृष्ट बन गया है जिस स्तर का कि हमारा इष्टदेव है। शरीर के अणु- परमाणुओं में गायत्री माता का वर्चस्व समा जाने से काया का हर अवयव ज्योर्तिमय हो उठा अग्नि से इन्द्रियों की लिप्सा जल कर भस्म हो गयी, आलस्य आदि दुर्गुण नष्ट हो गये। रोग- विकारों को उस अग्नि ने अपने में जला दिया। 

🔴 शरीर तो अपना है, पर उसके भीतर प्रचंड ब्रह्मवर्चस लहरा रहा है, व वाणी में केवल सरस्वती ही शेष है। असत्य, छल और स्वाद के वह असुर उस दिव्य मंदिर को छोड़कर पलायन कर गये। नेत्रों में गुण ग्राहकता और भगवान् का सौन्दर्य हर जड़- चेतन में देखने की क्षमता भर शेष है। छिद्रान्वेषण, कामुकता जैसे दोष आँखों में नहीं रहे। कान केवल जो मंगलमय हैं उसे सुनते हैं। बाकी कोलाहल मात्र है जो श्रवणेन्द्रिय के पर्दे से टकरा कर वापस लौट जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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