बुधवार, 8 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 10)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि 

🔵 विचारणीय यह है कि क्या सिद्धांत-रहित उपहार, मनुहार का लालची और किसी भी चाटुकार की सही-गलत मनोकामनाएँ पूरी करने वाला कोई परमेश्वर हो भी सकता है क्या? इस संदर्भ में किसी भी दृष्टिकोण से विचार करने पर उत्तर नहीं में ही देना पड़ता है; क्योंकि यह सिलसिला यदि चल पड़े तो रही-बची विवेकशीलता और न्यायनिष्ठा के परखचे ही उड़ जाएँगे।     

🔴 ऐसे कबायली परमेश्वर को पूजने वाले ही मनोकामनाएँ पूरी न होने पर उसे सौ गुनी गाली भी देते देखे गये हैं, जो कि आशाएँ लगाये रहने से पूर्व मिन्नतें करने और चमचागिरी दिखाने में अतिवाद की सीमा तक पहुँच जाते हैं। इस भ्रांत मान्यताओं वाले जंजाल को ही यदि परमेश्वर माना जाए तो फिर इसी के साथ एक बात और भी जान लेनी चाहिये कि इसके पीछे वास्तविकता कुछ भी न होने से लाभ कुछ भी नहीं होने वाला है। अंधे के हाथों कभी बटेर लग जाए तो बात दूसरी है, पर उससे भ्रांति पर आधारित मान्यता की पुष्टि नहीं होती।   

🔵 उपर्युक्त पंक्तियों को पढ़ने के उपरांत तथाकथित पूजा-पाठ करने वालों की मान्यताएँ डाँवाडोल हो सकती हैं। जो थोड़ी-बहुत आधे-अधूरे मन से टंट-घंट करते थे, उसमें भी कमी आ सकती है। भक्तिवाद की आड़ में यह मिथ्या भ्रम-जंजाल चलाते रहने वाले को तो अपने व्यवसाय में घाटा दीख पड़ते ही अनख होने में ऐसी स्थिति भी आ सकती है जो प्रतिपक्ष पर किसी भी स्तर का आक्रोश लेकर पिल पड़े, पर सही अध्यात्म की स्थापना करने के लिये यह भी सहना पड़े तो उद्यत रहना चाहिये।  
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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