बुधवार, 8 मार्च 2017

👉 निर्धनता से प्यार

🔵 संत फ्रांसिस एक धनवान् पिता के पुत्र थे। उनके यहाँ कपडे का बड़ा व्यापार होता था। अपने प्रारंभिक जीवन मे फ्रांसिस बडी शान से रहते थे। अच्छा-अच्छा खाते और कीमती कपडे पहनते थे। पर बाद में उनका हृदय ऐसा बदला कि उन्हें गरीबी से प्रेम हो गया। उन्होंने सब कुछ त्याग दिया और गरीबों की सेवा में लग गए।

🔴 एक बार एक भिखारी उनकी दुकान पर आया और बोला-भाई, मुझे कुछ खाने- पहनने को दो, मैं बहुत भूखा हूँ और जाड़े से मर रहा हूँ। फ़ांसिस को उसकी दशा पर बडी़ दया आई और उन्होंने उस गरीब को खाना खिलवाया और तन ढकने के लिये कपडा दिया। जब उनके पिता को इस बात का पता चला तो वे फ्रांसिस से बहुत बिगडे और बोले-धन इसलिए नहीं है कि वह इस तरह भिखमंगों को लुटा दिया जाए। संत फ्रांसिस को पिता की इस बात से बड़ा दुःख हुआ। वे सोचने लगे-वह धन यो बेकार की ही चीज है, जो गरीबों और असहायों की मदद करने में नहीं लगाया जा सकता। जब हजारों लोग हमारे सामने ही भूखों मर रहे हैं और नंगे रघूम हे हैं, तो हमें इस प्रकार धन जमा रखकर धनवान बने रहने का क्या अधिकार ? उन्हें धन से घृणा हो गई और वे शान-शौकत छोडकर सादे ढंग से रहने लगे।

🔵 एक बार फ्रांसिस घोड़े पर चढे़ हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक कोढ़ी दिखाई दिया। वह नंगा पडा पीड़ा से कराह रहा था। पहले तो उसकी दशा देखकर, उन्हें बडी घृणा हुई। पर तत्काल ही उनकी आत्मा ने कहा- 'धिक्कार है फ्रांसिस! जिसकी तुम्हें मदद करनी चाहिए, उसे देखकर तुम घृणा करते हो।'' उनकी मनुष्यता जाग उठी। वे तत्काल घोड़े से उतरे। कोढी को गले लगाया और सेवा से उसका कष्ट दूर किया। अपने पास के कपडे और पैसे उसे दे दिए।

🔴 इस उपकार से फ्रांसिस की आत्मा बडी़ करुण हो गई और निर्धनता के प्रति उनका प्रेम जाग उठा। वे दिन रात गरीबों की चिंता में रहने लगे। एक दिन उन्हें चिंतित देखकर, उनके एक मित्र ने कहा-''भाई आजकल बडे विचारशील बने रहते हो, क्या विवाह करने का विचार कर रहे हो ?'' फ्रांसिस ने उत्तर दिया- विचार तो कुछ ऐसा ही है। एक बडी़ सुंदर स्त्री से विवाह का विचार है। बताओ वह स्त्री कौन है "मित्र ने कहा-" "कोई भी हो, होगी बड़ी भाग्यवान्। बताओ वह कौन है ?'' फ्रांसिस ने कहा- "उस सुंदर देवी का नाम है निर्धनता।" मैं उसी से विवाह करने का विचार कर रहा हूँ। फ्रांसिस ने अपने विचार को चरितार्थ किया और न केवल निर्धनता ही स्वीकार कर ली बल्कि निर्धनों महान् सेवक बन गए।

🔵 फ्रांसिस एक बार गिरजाघर में प्रार्थना करने गए। गिरजाघर बड़ा टूटा-फूटा था। भगवान् के घर की यह दशा देखकर उन्हें बडा दुःख हुआ। वे घर आए और कपडे की कई गाठे और अपना घोड़ा बेच डाला। उसका सारा पैसा ले पाकर पुजारी  को गिरजाघर की मरम्मत के लिये दे दिया।

🔴 पिता को पता चला तो उन्होने फ्रांसिस को बहुत मारा और विशप के पास ले जाकर कहा कि यह लड़का मेरा धन बरबाद किये जा रहा है, मैं इसे अपनी संपत्ति से वंचित कर चाहता हूँ।

🔵 पिता की बात सुनकर फ्रांसिस खुशी से उछल पडे़, बोले-आपने मुझे एक बहुत बडे मोह-बंधन से मुक्त कर दिया है। मैं स्वयं ही उस संपत्ति को दूर से प्रणाम करता हूँ, जो 'परमार्थ और परोपकार में काम नहीं आ सकती।' इतना कहकर उन्होंने कपडे तक उतारकर रख दिए और एक चोगा पहन चले गए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 71, 72

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