मंगलवार, 1 जून 2021

👉 गुरु दक्षिणा

एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा- ‘गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं। इनमें कौन सही है?’

गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया- ‘पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं।’

यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था। गुरु जी को इसका आभास हो गया।वे कहने लगे- ‘लो,तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ। ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।’

उन्होंने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी-

एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए।गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे- ‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?’

वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे। सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले- "जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा।’'
 
अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहूंच चुके थे।लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं, उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया।वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे। अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था। अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके। वहाँ पहूंच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी। पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी।।अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये।

गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेह पूर्वक पूछा- ‘पुत्रो, ले आये गुरुदक्षिणा?’  

तीनों ने सर झुका लिया।

गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा-  ‘गुरुदेव, हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये। हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं।"   

गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले- ‘निराश क्यों होते हो? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो।’

तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये।
       
वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था, अचानक बड़े उत्साह से बोला- ‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं।आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है।’

गुरु जी भी तुरंत ही बोले- ‘हाँ, पुत्र, मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके। दूसरे, यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप, स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें।’

"यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी। सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है। वस्तुतः, हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’  पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है।

अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २६)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

किसी की यह धारणा सर्वथा मिथ्या है कि सुख का निवास किन्हीं पदार्थों में है। यदि ऐसा रहा होता तो वे सारे पदार्थ जिन्हें सुखदायक माना जाता है, सबको समान रूप से सुखी और सन्तुष्ट रखते अथवा उन पदार्थों के मिल जाने पर मनुष्य सहज ही सुख सम्पन्न हो जाता किन्तु ऐसा देखा नहीं जाता। संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्हें संसार के वे सारे पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिन्हें सुख का संराधक माना जाता है। किन्तु ऐसे सम्पन्न व्यक्ति भी असन्तोष, अशान्ति, अतृप्ति अथवा शोक सन्तापों से जलते देखे जाते हैं। उनके उपलब्ध पदार्थ उनका दुःख मिटाने में जरा भी सहायक नहीं हो पाते।

वास्तविक बात यह है कि संसार के सारे पदार्थ जड़ होते हैं। जड़ तो जड़ ही है। उसमें अपनी कोई क्षमता नहीं होती। न तो जड़ पदार्थ किसी को स्वयं सुख दें सकते हैं और न दुःख। क्योंकि उनमें न तो सुखद तत्व होते हैं और न दुःखद तत्व और न उनमें सक्रियता ही होती है, जिससे वे किसी को अपनी विशेषता से प्रभावित कर सकें। यह मनुष्य का अपना आत्म-तत्व ही होता है, जो उससे सम्बन्ध स्थापित करके उसे सुखद या दुःखद बना लेता है। आत्म तत्व की उन्मुखता ही किसी पदार्थ को किसी के लिये सुखद और किसी के लिये दुःखद बना देती है।

जिस समय मनुष्य का आत्म-तत्व सुखोन्मुख होकर पदार्थ से सम्बन्ध स्थापित करता है, वह सुखद बन जाता है और जब आत्मतत्व दुःखोन्मुख होकर सम्बन्ध स्थापित करता है, तब वही पदार्थ उसके लिये दुःखद बन जाता है। संसार के सारे पदार्थ जड़ हैं, वे अपनी ओर से न तो किसी को सुख दें सकते हैं और दुःख। यह मनुष्य का अपना आत्म-तत्व ही होता है, जो सम्बन्धित होकर उनको दुःखदायी अथवा सुखदायी बना देता है। यह धारणा कि सुख की उपलब्धि पदार्थों द्वारा होती है, सर्वथा मिथ्या और अज्ञानपूर्ण है।

किन्तु खेद है कि मनुष्य अज्ञानवश सुख-दुःख के इस रहस्य पर विश्वास नहीं करते और सत्य की खोज संसार के जड़ पदार्थों में किया करते हैं। पदार्थों को सुख का दाता मानकर उन्हें ही संचय करने में अपना बहुमूल्य जीवन बेकार में गंवा देते हैं। केवल इतना ही नहीं कि वे सुख आत्मा में नहीं करते बल्कि पदार्थों के चक्कर में फंसकर उनका संचय करने लिये अकरणीय कार्य तक किया करते हैं। झूंठ, फरेब, मक्कारी, भ्रष्टाचार, बेईमानी आदि के अपराध और पाप तक करने में तत्पर रहते हैं। सुख का निवास पदार्थों में नहीं आत्मा में है। उसे खोजने और पाने के लिये पदार्थों की ओर नहीं आत्मा की ओर उन्मुख होना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २६)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

यमुना से थोड़ी ही दूर लेकिन उनकी कुटी के पास ही महर्षि शमीक का गुरुकुल था। उस युग में जबकि जाति-वंश, कुलीन-अकुलीन की विभाजक रेखाओं से समाज बँटा हुआ था, उस समय भी उनके गुरुकुल में ‘जाति वंश सब एक समान-मानव मात्र एक समान’ के अनुसार ही आचरण होता था। अध्ययन, अध्यापन, तप एवं भक्ति यही जीवन था महर्षि का। लोक मर्यादाओं एवं वेद आज्ञाओं का महर्षि निष्ठापूर्वक पालन करते थे।
    
त्रिकाल सन्ध्यावन्दन, गायत्री जप, नियमित यज्ञ, एकादशी आदि पर्वों पर व्रत करना महर्षि शमीक कभी नहीं भूलते थे। समय के साथ उनके शरीर को जरा अवस्था ने घेर लिया। महर्षि व्यास जब उनसे मिले थे, वह पर्याप्त वृद्ध हो चुके थे। उनके सिर के बाल पूरी तरह से श्वेत हो चुके थे। मुख पर यतिं्कचित झुर्रियाँ आ चुकी थीं, परन्तु उनके नेत्रों में अनोखी प्रदीप्ति थी और वाणी में मधुरता एवं ओज का अनूठा सम्मिश्रण था।

प्रातःकाल जिस समय भगवान वेदव्यास महर्षि शमीक से मिले थे। वह सन्ध्या, यज्ञ आदि नित्यकर्मों को समाप्त कर गो-सेवा कर रहे थे। आश्रम में रहने वाली गायों की सेवा कार्य में महर्षि शमीक स्वयं लगते थे। हालाँकि उनके साथ आश्रम के अंतेवासी भी कार्यरत होते थे, परन्तु आचार्य शमीक का उत्साह देखते ही बनता था। आश्रम में अध्ययन करने वाले ब्रह्मचारियों एवं अन्य आचार्यगणों के मना करने पर भी उस गुरुकुल के कुलपति आचार्य शमीक अन्य सभी छोटे-बड़़े कार्यों को स्वयं करते थे।
    
प्रातःबेला में वेदव्यास जब आचार्य शमीक के गुरुकुल पहुँचे तो कुलपति शमीक अपने सेवा कार्यों में लगे हुए थे। ज्यों ही उन्होंने ऋषि व्यास को देखा, े लगभग दौड़ते हुए ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। महर्षि व्यास ने उन्हें झटपट उठाकर छाती से लगा लिया। वह महर्षि व्यास का हाथ थामकर उन्हें पास ही के कदम्ब वृक्ष के पास ले गये। आश्रम के ब्रह्मचारियों ने वहाँ पहले से ही दमसिन बिछा रखे थे। दोनों महर्षि वहाँ बैठकर तत्त्वचर्चा करने लग गये। कुछ ही पलों में गुरुकुल के एक आचार्य दो ब्रह्मचारियों के साथ प्रातराश लेकर आ गये।
    
प्रातराश को वहीं पास में रखकर वह आचार्य, ब्रह्मचारियों के साथ हाथ जोड़कर खड़े हो गये। उन्हें इस तरह कुछ देर खड़े हुए देख महर्षि व्यास ने उनसे प्रश्न किया- ‘‘तुम्हें कुछ कहना है वत्स?’’ ‘‘हाँ भगवन्! यदि आप अनुमति दें तो।’’ आचार्य के साथ ही वे दोनों ब्रह्मचारी बोल पड़े। ‘‘कहो! वत्स कहो-क्या कहना है?’’ भगवान व्यास के अनुमति देने के बाद वे आचार्य अपने ब्रह्मचारियों के साथ कहने लगे- ‘‘भगवन्! हमारे कुलपति आचार्य शमीक अब दीर्घायु हो चुके हैं। अब हम सबके होते हुए क्या उन्हें इस तरह से आश्रम के छोटे-छोटे कार्यों को करते हुए थकना चाहिए। आप उन्हें समझाएँ कि वे स्वयं सेवाकार्य न करके यदि हम सबको अपना मार्गदर्शन दें तो ठीक होगा।’’
    
जब ये आश्रमवासी महर्षि व्यास से अपनी बात कह रहे थे तो ऋषि शमीक मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। इनके कथन की समाप्ति पर व्यास ने ऋषि शमीक के मुख की ओर देखा। उनकी आँखों में प्रश्न की रेखा थी। शमीक समझ गये और कहले लगे- ‘‘भगवन! आप तो शास्त्रों के रचनाकार हैं। लोक मान्यता एवं वेद वचन के मर्मज्ञ विद्वान हैं। क्या हम भगवद्भक्तों को लोक एवं वेद की अवज्ञा करनी चाहिए?’’ आचार्य शमीक के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान व्यास ने उनसे एक नया प्रश्न किया- ‘‘आचार्य आप तो भक्ति की परम भावदशा को पा चुके हैं। आप सभी विधि-निषेध से परे हैं। ऐसे में भला आपको ये लघु मर्यादाएँ कहाँ बाँध सकती हैं?’’ महर्षि व्यास के प्रश्न के उत्तर में गम्भीर होते हुए आचार्य शमीक कहने लगे- ‘‘जब तक शरीर है तब तक मर्यादाओं का रक्षण अनिवार्य है और फिर भक्त को ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिए, जिससे भगवान की पावन महिमा को ठेस पहुँचे।’’
    
अपनी स्मृतियों में सँजोयी इस कथा को कहते हुए व्यास जी ने कहा- ‘‘भक्त शमीक की कथा सचमुच ही इस सूत्र की जीवन्त व्याख्या है।’’ इस कथा को सुनकर सभी ने भगवान व्यास को साधुवाद दिया और बोले- ‘‘सचमुच ही शास्त्र का रक्षण भक्त का कर्त्तव्य है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५३

सोमवार, 31 मई 2021

👉 'सफल जीवन'

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा-
गुरुदेव ये 'सफल जीवन' क्या होता है?

गुरु शिष्य को पतंग उड़ाने ले गए।
शिष्य गुरु को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था.

थोड़ी देर बाद शिष्य बोला-

गुरुदेव.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें? ये और ऊपर चली जाएगी।

गुरु ने धागा तोड़ दिया ..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...

तब गुरु ने शिष्य को जीवन का दर्शन समझाया...
बेटे..  'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं; जैसे :
-घर-
 -परिवार-
  -अनुशासन-
   -माता-पिता-
    -गुरू-और-
     -समाज-

और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

वास्तव में यही वो धागे होते हैं - जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..

इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'

अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."

धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन कहते हैं.."

घर पर ही रहकर अपना और अपने का ध्यान रखे सभी का जीवन मंगलमय हो।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २५)

👉 तत्वज्ञान क्या है

अब यहां पर ज्ञान का स्वरूप जानने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर दुःख की उत्पत्ति होती किन कारणों से? वैसे तो जीवात्मा अपने मूल रूप में आनन्दमय है। तब अवश्य ही कोई कारण ऐसा होना चाहिये जो उसके लिये दुःख की सृष्टि करता है। उसको भी योगवाशिष्ठ में इस प्रकार बताया गया है—
‘‘देह दुःख विदुर्व्याधि
माध्याख्यं मानसामयम् ।
मौर्ख्य मूले हते विद्या
तत्वज्ञाने परीक्षयः ।।’’
—शारीरिक दुःखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहते हैं। यह दोनों मुख्य अर्थात् अज्ञान से ही उत्पन्न होती हैं और ज्ञान से नष्ट होती हैं।

संसार के सारे दुःखों का एकमात्र हेतु अविद्या अथवा अज्ञान ही है। जिस प्रकार प्रकाश का अभाव अन्धकार है और अन्धकार का अभाव प्रकाश होता है, उसी प्रकार ज्ञान का अभाव अज्ञान और अज्ञान का ज्ञान होना स्वाभाविक ही है और जिस प्रकार ज्ञान का परिणाम सुख-शान्ति और आनन्द है उसी प्रकार अज्ञान का फल दुःख, अशान्ति और शोक-सन्ताप होना ही चाहिये।

यह युग-युग का अनुभूत तथा अन्वेषित सत्य है कि दुःखों की उत्पत्ति अज्ञान से ही होती है और संसार के सारे विद्वान, चिन्तक एवं मनीषी जन इस बात पर एकमत पाये जाते हैं। इस प्रकार सार्वभौमिक और सार्वजनिक रूप से प्रतिपादित तथ्य में संदेह की गुंजाइश रह ही नहीं जाती—इस प्रकार अपना-अपना मत देते हुये विद्वानों ने कहा है—चाणक्य ने लिखा—‘‘अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं है।’’ विश्वविख्यात दार्शनिक प्लेटो ने कहा है—‘अज्ञानी रहने से जन्म न लेना ही अच्छा है, क्यों कि अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का मूल है।’’ शेक्सपियर ने लिखा है—‘‘अज्ञान ही अन्धकार है।’’

जीवन की समस्त विकृतियों, अनुभव होने वाले दुःखों, उलझनों और अशान्ति आदि का मूल कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही होता है। यही मनुष्य का परम शत्रु है। अज्ञान के कारण ही मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह अनेक दृष्टियों से हीन अवस्था में ही पड़ा रहता है। ज्ञान के अभाव में जिनका विवेक मन्द ही बना रहता है उनके जीवन के अन्धकार में भटकते हुये तरह-तरह के त्रास आते रहते हैं। अज्ञान के कारण ही मनुष्य को वास्तविक कर्तव्यों की जानकारी नहीं हो पाती इसलिये वह गलत मार्गों पर भटक जाता है और अनुचित कर्म करता हुआ दुःख का भागी बनता है। इसलिये दुःखों से निवृत्ति पाने के लिये यदि उनका कारण अज्ञान को मिटा दिया जाये तो निश्चय ही मनुष्य सुख का वास्तविक अधिकारी बन सकता है।

अज्ञान का निवारण ज्ञान द्वारा ही हो सकता है। शती उसकी विपरीत वस्तु आग द्वारा ही दूर होता है। अन्धकार की परिसमाप्ति प्रकाश द्वारा ही सम्भव है। इसलिये ज्ञान प्राप्त का जो भी उपाय सम्भव हो उसे करते ही रहना चाहिये।

ज्ञान का सच्चा स्वरूप क्या है? केवल कतिपय जानकारियां ही ज्ञान नहीं माना जा सकता। सच्चा ज्ञान वह है जिसको पाकर मनुष्य आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर सके। अपने साथ अपने इस संसार को पहचान सके। उसे सत् और असत् कर्मों की ठीक-ठीक जानकारी रहे और वह जिसकी प्रेरणा से असत् मार्ग को त्याग कर सन्मार्ग पर असंदिग्ध रूप से चल सके। कुछ शिक्षा और दो-चार शिल्पों को ही सीख लेना भर अथवा किन्हीं उलझनों को सुलझा लेने भर की बुद्धि ही ज्ञान नहीं है। ज्ञान वह है जिससे जीवन-मरण, बन्धन-मुक्ति, कर्म-अकर्म और सत्य-असत्य का न केवल निर्णय ही किया जा सके बल्कि गृहणीय को पकड़ा और अग्राह्य को छोड़ा जा सके, वह ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है।
अज्ञान की स्थिति में कर्मों का क्रम बिगड़ जाता है। संसार में जितने भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्व हैं वे सब कर्मों का फल होता है। अज्ञान द्वारा अपकर्म होना स्वाभाविक ही है और तब उनका दण्ड मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। इतना ही क्यों सकाम भाव से किये सत्कर्म सुख के फल रूप में परिपक्व होते हैं और असत्य होने से कुछ ही समय में दुःख रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इसलिये कर्म ही अधिकतर बन्धनों अथवा दुःख को मनुष्य पर आरोपित कराते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २५)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

हिमालय के श्वेतशिखरों पर भगवान सूर्य अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्ण राशि उड़ेलने लगे थे। सूर्यदेव के इस अपूर्व अनुदान से हिमालय का यह सम्पूर्ण प्रान्त स्वर्णिम आभा से भर रहा था। थोड़ी दूर पर ही स्थित हिम झील का जल भी इस आभा को अपने में समेट रहा था। यहाँ पर उपस्थित ऋषियों एवं देवों के समुदाय ने अपने प्रातःकर्म पूरे कर लिये थे। अभी कुछ ही देर पहले उन्होंने भगवान भुवनभास्कर से सम्पूर्ण जगती के लिए ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ की याचना की थी। ‘‘निर्मल बुद्धि, निर्मल भावनाओं से जन्म पाती है’’- ब्रह्मर्षि विश्वामित्र महर्षि क्रतु से कह रहे थे। आज न जाने क्यों उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था। ‘‘भावनाएँ दूषित हों तो बुद्धि एवं कर्म सभी दूषित हो जाते हैं।’’
    
ऐसा लग रहा था कि प्रह्लाद की पावन भगवद्भक्ति का मधुर गीत अभी भी उनके अंतःस्रोत से झर रहा था। ‘‘परम भगवद्भक्त होते हुए भी प्रह्लाद ने कितना सौम्य व सदाचारपूर्ण जीवन जिया था। सभी विधि-निषेधों से परे होते हुए भी उन्होंने सभी विधि-निषेधों को माना। लोक और वेद को उन्होंने अपने आचरण से महिमामण्डित किया।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस अंतर्वाणी को देवर्षि नारद अपने अंतःकरण में जैसे सुन रहे थे। वे किंचित हँसते हुए बोले-‘‘यदि ऋषि समुदाय की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ देवर्षि के इस वचन का ऋषि समुदाय एवं योगित्य वर्ग ने ‘अहोभाग्य’ कहकर स्वागत किया।
‘लोकेवेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता॥ ११॥’
    
देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह कथा सूत्र प्रकट हुआ। इसे प्रकट करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘भक्त लोक और वेद के अनुकूल आचरण करता है। इसके विरोधी आचरण के प्रति वह उदासीन रहता है।’’ देवर्षि की बात के सूत्र को पकड़ते हुए महर्षि देवल बोल पड़े- ‘‘लोक और वेद की मर्यादाओं की अवहेलना तो उद्धत अहं करता है। भक्त तो सर्वथा अहं शून्य और विनम्र होता है। उससे तो कभी किसी तरह से मर्यादाओं की अवहेलना होती ही नहीं।’’ ‘‘सत्य यही है’’- कहते हुए वेदज्ञान को सम्पादित करने वाले, पुराणों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास को यमुना तीर पर कुटी बनाकर तपश्चर्या करने वाले भक्तवर शमीक की याद आ गयी। ऋषि शमीक हस्तिनापुर से थोड़ी दूर यमुना किनारे कुटिया बनाकर रहते थे। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे-ऋषि शमीक। वे अपने आराध्य को कण-कण में देखने के अभ्यासी थे। सृष्टि का जड़ चेतन उनकी दृष्टि में उनके आराध्य का प्रतिरूप था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५२


शनिवार, 29 मई 2021

👉 ईश्वर से डर

एक दिन सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है।
मैंने कहा, "जी कहिए.."
तो उसने कहा,अच्छा जी, आप तो  रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे?
मैंने  कहामाफ कीजिये, भाई साहब! मैंने पहचाना नहीं आपको..."

तो वह कहने लगे, "भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया है... अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र में बसे हो पर नज़र नहीं आते... लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"

मैंने चिढ़ते हुए कहा,"ये क्या मज़ाक है?" "अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हें ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख-सुन नही पाएगा मुझे। "कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी.. "अकेला ख़ड़ा-खड़ा क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है, चल आजा अंदर.अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था कि बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पीया कि मैं गुस्से से चिल्लाया,अरे मॉं, ये हर रोज इतनी चीनी? "इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नहीं आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी  दिया कि 'भई, तुम नज़र में हो आज... ज़रा ध्यान से!'

बस फिर मैं जहाँ-जहाँ... वह मेरे पीछे-पीछे पूरे घर में... थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..मैंने कहा, "प्रभु, यहाँ तो बख्श दो..."

खैर, नहाकर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में  महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, 'तुम नज़र में हो।'

कार को साइड में रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि 'इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे' ...पर ये  तो गलत था, : पाप था, तो प्रभु के सामने ही कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,"आप आ जाइये। आपका काम हो  जाएगा।"

फिर उस दिन आफिस में ना स्टॉफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की 25-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जातीं थीं मुँह से, पर उस दिन सारी गालियाँ, 'कोई बात नहीं, इट्स ओके...'में तब्दील हो गयीं।

वह पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द, बेईमानी, झूंठ- ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बने।
शाम को ऑफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया...

"प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभाएं... उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी..."
घर पर रात्रि-भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,
"प्रभु, पहले आप लीजिये।"

और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। भोजन के बाद माँ बोली, "पहली बार खाने में कोई कमी नहीं निकाली आज तूने। क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या, आज?"

मैंने कहा माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है... रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद में कोई कमी नहीं होती।"

थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग  के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,
"आज तुम्हें नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।"

गहरी नींद गालों पे थपकी से उठी
कब तक सोयेगा .., जाग जा अब।
माँ की आवाज़ थी... सपना था शायद... हाँ, सपना ही था पर नीँद से जगा गया... अब समझ में आ गया उसका इशारा...

"तुम मेरी नज़र में हो...।"
जिस दिन ये समझ गए कि "वो" देख रहा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सपने में आया एक विचार भी आँखें खोल सकता है।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २४)

👉 दुखों का कारण

पूर्वोक्त लौकिक आनन्दों में यह विशेषताएं नहीं होतीं। उनकी प्राप्ति के लिये कारण और साधन की आवश्यकता होती है। वह किसी हेतु से उत्पन्न होता है और हेतु के मिट जाने पर नष्ट हो जाता है। इतना ही क्यों—यदि एक बार उसका आधार बना भी रहे तो भी उस आनन्द में जीर्णता, क्षीणता, प्राचीनता और अरुचिता आ जाती है। लौकिक आनन्दों की परि-समाप्ति दुःख में ही होती है। आज जो किसी कारण से प्रसन्न है, आनन्दित है वह कल किसी कारण से दुःखी होने लगता है। लौकिक आनन्द की कितनी ही मात्रा क्यों न मिलती जाय, तथापि और अधिक पाने की प्यास बनी रहती है। उससे न तृप्ति मिलती है और न सन्तोष। जिस अनुभूति में अतृप्ति, असन्तोष और तृष्णा बनी रहे वह आनन्द कैसा? लौकिक आनन्द के कितने ही सघन वातावरण में क्यों न बैठे हों एक छोटा-सा अप्रिय समाचार या छोटी-सी दुःखद बात उसे समूल नष्ट कर देती है। तब न किसी के मुख पर हंसी रह जाती है और न हृदय में पुलक! लौकिक आनन्द और मोक्षानन्द की परस्पर तुलना ही नहीं की जा सकती।

लौकिक आनन्दों में इस असफलता का कारण यह होता है कि वे असत्य एवं भ्रामक होते हैं। उनकी अनुभूति, प्रवंचना अथवा मृगतृष्णा के समान ही होती है। इस असत्यता का दोष ही लौकिक आनन्द को निकृष्ट एवं अग्राह्य बना देते हैं। आनन्द केवल आत्मिक आनन्द ही होता है। मोक्ष का आनन्द ही वास्तविक तथा अन्वेषणीय आनन्द है। लौकिक आनन्दों की अग्राह्यता का प्रतिपादन इसीलिये किया गया है कि जो व्यक्ति उसके झूंठे प्रवचनों में फंस जाता है, उन्हें पकड़ने, पाने के लिये दौड़ता रहता है, उनको स्थिर और स्थायी बनाने में लगता है, वह अपना सारा जीवन इसी मायाजाल में उलझकर खो देता है। भ्रम में पड़े रहने के कारण उसे वास्तविकता का ध्यान ही नहीं आता। लौकिक आनन्दों के फेर में पड़कर जिसे वास्तविक आनन्द का ध्यान ही न आयेगा वह उसको पाने के लिये प्रयत्नशील भी क्यों होगा। जिस हिरण को मरुमरीचिक जल भ्रम में भुला लेती है तन-मन से उसी को पकड़ने के पीछे पड़ा रहता है। अब पाया, अब पाया करता हुआ वह निःसार दुराशा का यन्त्र बना भटकता रहता है और इस प्रकार वास्तविक जल की खोज से वंचित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि भटक-भटक कर प्यासा ही मर जाता है। जिस जीवन में वह पानी और परितृप्ति दोनों को पाकर कृतार्थ हो सकता था वह जीवन यों ही चला जाता है, नष्ट हो जाता है। यही हाल लौकिक आनन्दवादियों का होता है। जिस जीवन में वे मोक्ष और उसका वास्तविक सुख प्राप्त कर सकते हैं वे उसे माया-छाया और भ्रामक सुख की मरीचिका में नष्ट कर अपनी अनन्त हानि कर लेते हैं। इसीलिये लौकिक सुखों को प्रबलता के साथ अग्राह्य एवं गर्हित बताया गया है। वास्तविक आनन्द लौकिक लिप्साओं और सांसारिक भोग-विलासों में नहीं है वह मोक्ष और मोक्ष की स्थिति में है। उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिये, वही मानव जीवन का लक्ष्य है, उसी में शांति और तृप्ति मिलेगी।

इस प्रकार स्पष्ट है कि दुःख तो दुःख ही है सांसारिक सुख भी दुःख का एक स्वरूप है। इनकी निवृत्ति से ही सच्चे सुख की प्राप्ति सम्भव है। किन्तु इनकी निवृत्ति का उपाय क्या है? इसके लिये पुनः योगवाशिष्ठ में कहा गया है—
‘‘ज्ञानान्निर्दुःखतामेति
ज्ञानादज्ञान संक्षयः ।
ज्ञानादेव परासिद्धि
नन्दियस्याद्राम वस्तुतः ।।’’

—हे राम! ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि होती है और किसी उपाय से नहीं।
और भी आगे बताया गया है—
‘‘प्रज्ञा विज्ञात विज्ञेय
सम्यग् दर्शन माधयः ।
न दहन्ति वनं वर्षा
सिक्तमग्निशिखा इव ।’’
—जिसने जानने योग्य को जान लिया है और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी को दुःख उसी प्रकार त्रासक नहीं होते जिस प्रकार वर्षा से भीगे जंगल को अग्नि शिखा नहीं जा पाती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २४)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता
    
भक्तों में अग्रणी प्रह्लाद। भावनाओं में परम अनन्यता की भावमयी मूर्ति प्रह्लाद। इन भक्तश्रेष्ठ के नाम में ही कुछ जादू था। सभी इनके स्मरण मात्र से भाव विह्वल हो गये। श्रवण की उत्सुकता जाग्रत हुई। हरिवाहन-विनितानन्दन गरुड़ कह रहे थे- ‘‘मैं भक्तश्रेष्ठ प्रह्लाद के भक्तिमय जीवन के कई पावन पलों का स्वयं साक्षी रहा हूँ। उन्होंने तो अपनी माँ के गर्भ में ही भक्ति का पाठ पढ़ा था। उस समय उनकी माता देवर्षि के सान्निध्य में रह रही थीं।’’
    
पक्षीराज गरुड़ के स्वरों ने देवर्षि की स्मृतियों को कुरेद दिया। उन्हें याद हो आये वे बीते दिन, जब वे अपनी भ्रमणकारी प्रवृत्ति के विपरीत एक स्थान पर स्थिर होकर रहे थे। प्रह्लाद की माता उनके आश्रम में प्रभु भक्ति में लीन रहती थीं। आश्रम के समीप का वह वनप्रान्त एक नवीन भावचेतना से पूरित हो गया था। अपनी माता के गर्भ में स्थित प्रह्लाद की चेतना चारों ओर एक दैवीभाव बिखेर रही थी। देवर्षि स्वयं उन्हें भक्ति के नवीन सूत्र सुनाया करते थे। उन्हीं दिनों उन्हें अनन्यता के उपदेश मिले थे।
    
अपनी स्मृतियों में विभोर देवर्षि को चेतन जब आया, जब गरुड़ जी के स्वर उनके कानों में पड़े। वह कह रहे थे कि ‘‘भक्त प्रह्लाद अपने गर्भकाल से ही असुरता के निशाने पर थे। उन्हें उस युग के सबसे महाशक्तिशाली जनों के कोप का भाजन बनना पड़ा। प्रह्लाद के पिता महाशक्तिशाली सम्राट हिरण्यकश्यपु एवं महान् तांत्रिक एवं यौगिक शक्तियों से सम्पन्न शुक्राचार्य। अपने युग की ये दो महान् शक्तियाँ प्रत्येक ढंग से प्रह्लाद का विनाश चाहती थीं। प्रह्लाद की मृत्यु ही इन दोनों का लक्ष्य थी। इनके पास अनेक साधन थे। अनेकों ढंग से ये हर दिन प्रह्लाद के विनाश की योजनाएँ रचते थे।
    
लेकिन प्रह्लाद को केवल नारायण के नाम का आश्रय था। नारायण के नाम और अपने नारायण की भक्ति के सिवा उन्होंने कभी किसी साधन या साधना के बारे में नहीं सोचा अन्यथा प्रतिभाशाली एवं असीम धैर्यवान् प्रह्लाद कभी भी किसी साधना में प्रवीण हो सकते थे। तंत्र एवं योग की सभी प्रक्रियाओं का ज्ञान उनके लिए सम्भव था। परन्तु इस अनूठे भक्त की अनन्य भक्ति तो केवल अपने भगवान के लिए थी। भगवान! भगवान!! और सिर्फ भगवान!!! अन्य कुछ भी नहीं।
    
सम्राट हिरण्यकश्यपु के प्रहार संघातक थे। कारागार की यातनाएँ, कभी पहाड़ से फिंकवाना तो कभी हाथी के नीचे कुचलवाने का आदेश देना, कभी उन्हें समुद्र में डुबा देने का आदेश। इतने पर भी जब उसे संतोष न हुआ तो अपनी वर प्राप्त बहन होलिका को प्रह्लाद को जला देने के लिए कहना। नित-नयी आपत्तियों को भक्त प्रह्लाद वरदान की तरह मानते थे। जब उन्हें होलिका ने जला देने का प्रयास किया तब इस घटना में होलिका की मृत्यु हो गयी। प्रह्लाद को उसकी मृत्यु पर सहज दुःख हुआ।
ऐसे में एक दिन उन्होंने देवर्षि से कहा था- ‘‘देवर्षि! मैं इतने लोगों के दुःख का कारण क्यों हूँ?’’ तब देवर्षि ने उनसे कहा- ‘‘पुत्र! तुम नहीं, उनकी प्रवृत्तियाँ उनके दुःखों का कारण हैं।’’ इसके बाद देवर्षि ने उनके मन को टटोलते हुए पूछा- ‘‘वत्स! क्या तुम्हें इन आपदाओं से कभी डर लगता है।’’ उत्तर में प्रह्लाद बड़े ही निश्छल भाव से हँसे और कहने लगे- ‘‘हे देवर्षि! मुझे तो आप ने ही यह पाठ पढ़ाया है कि भक्त के जीवन में आने वाली आपदाएँ, भक्त एवं भगवान दोनों की परीक्षा लेती हैं। भक्त की यह परीक्षा होती है कि उसकी प्रभुभक्ति कितनी प्रगाढ़ एवं अनन्य है और भगवान की परीक्षा कि वह अपने अनन्य भक्त की किस कुशलता से रक्षा करते हैं। साथ ही आपने यह भी बताया था कि भक्त से भले ही चूक हो जाये, परन्तु भगवान कभी भी नहीं चूकते। उनसे भक्त रक्षा में कभी प्रमाद नहीं होता।
    
और सचमुच ही भगवान नहीं चूके। उन्होंने अपने भक्त के लिए नृसिंह का रूप धरा। हिरण्यकश्यपु के घातक प्रहारों का उन्होंने संहार किया। भक्त प्रह्लाद की अनन्यता प्रभु भक्तों का अनुकरणीय आदर्श बनी।’’ गरुड़ के मुख से इस कथा को सुनकर महर्षियों के मुख पर प्रसन्नता के भाव छलके। उन्होंने हर्षित होकर कहा- ‘‘धन्य है भक्त प्रह्लाद, जिन्होंने भगवद्भक्ति की मर्यादाओं को परमोज्ज्वल रूप प्रदान दिया।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५०

गुरुवार, 27 मई 2021

👉 दोषारोपण🌻🌻

एक आदमी रेगिस्तान से गुजरते वक़्त बुदबुदा रहा था,“कितनी बेकार जगह है ये,बिलकुल भी हरियाली नहीं है और हो भी कैसे सकती है यहाँ तो पानी का नामो-निशान भी नहीं है।

तपती रेत में वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था उसका गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. अंत में वो आसमान की तरफ देख झल्लाते हुए बोला- क्यों भगवान आप यहाँ पानी क्यों नहीं देते? अगर यहाँ पानी होता तो कोई भी यहाँ पेड़-पौधे उगा सकता था और तब ये जगह भी कितनी खूबसूरत बन जाती!

ऐसा बोल कर वह आसमान की तरफ ही देखता रहा मानो वो भगवान के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो!तभी एक चमत्कार होता है,नज़र झुकाते ही उसे सामने एक कुंवा नज़र आता है!

वह उस इलाके में बरसों से आ-जा रहा था पर आज तक उसे वहां कोई कुँवा नहीं दिखा था… वह आश्चर्य में पड़ गया और दौड़ कर कुंवे के पास गया। कुंवा लाबालब पानी से भरा था.  

उसने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा और पानी के लिए धन्यवाद करने की बजाये बोला - “पानी तो ठीक है लेकिन इसे निकालने के लिए कोई उपाय भी तो होना चाहिए !!”

उसका ऐसा कहना था कि उसे कुँवें के बगल में पड़ी रस्सी और बाल्टी दिख गयी।एक बार फिर उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वह कुछ घबराहट के साथ आसमान की ओर देख कर बोला, “लेकिन मैं ये पानी ढोउंगा कैसे?”

तभी उसे महसूस होता है कि कोई उसे पीछे से छू रहा है,पलट कर देखा तो एक ऊंट उसके पीछे खड़ा था!अब वह आदमी अब एकदम घबड़ा जाता है, उसे लगता है कि कहीं वो रेगिस्तान में हरियाली लाने के काम में ना फंस जाए और इस बार वो आसमान की तरफ देखे बिना तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगता है।

अभी उसने दो-चार कदम ही बढ़ाया था कि उड़ता हुआ पेपर का एक टुकड़ा उससे आकर चिपक जाता है।उस टुकड़े पर लिखा होता है –

मैंने तुम्हे पानी दिया,बाल्टी और रस्सी दी।पानी ढोने  का साधन भी दिया,अब तुम्हारे पास वो हर एक चीज है जो तुम्हे रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए चाहिए। अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है ! आदमी एक क्षण के लिए ठहरा !! पर अगले ही पल वह आगे बढ़ गया और रेगिस्तान कभी भी हरा-भरा नहीं बन पाया।

मित्रों !! कई बार हम चीजों के अपने मन मुताबिक न होने पर दूसरों को दोष देते हैं। कभी हम परिस्थितियों को दोषी ठहराते हैं,कभी अपने बुजुर्गों को,कभी संगठन को तो कभी भगवान को।पर इस दोषारोपण के चक्कर में हम इस आवश्यक चीज को अनदेखा कर देते हैं कि - एक इंसान होने के नाते हममें वो शक्ति है कि हम अपने सभी सपनो को खुद साकार कर सकते हैं।

शुरुआत में भले लगे कि ऐसा कैसे संभव है पर जिस तरह इस कहानी में उस इंसान को रेगिस्तान हरा-भरा बनाने के सारे साधन मिल जाते हैं उसी तरह हमें भी प्रयत्न करने पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी सारे उपाय मिल सकते हैं.

👉 दोस्तॊ !! समस्या ये है कि ज्यादातर लोग इन उपायों के होने पर भी उस आदमी की तरह बस शिकायतें करना जानते है। अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बदलना नहीं! तो चलिए,आज इस कहानी से सीख लेते हुए हम शिकायत करना छोडें और जिम्मेदारी लेकर अपनी दुनिया बदलना शुरू करें क्योंकि सचमुच सब कुछ तुम्हारे हाथ में है !!

🌸हम बदलेंगे, युग बदलेगा।🌸

👉 भक्तिगाथा (भाग २३)

अन्य आश्रयों का त्याग ही है अनन्यता

आँखों में छलकते भावबिन्दु, हृदयों में उफनती भावोर्मियाँ-सभी की अंतर्चेतना गहन भावसमाधि में डूबने लगी। कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे कि कालचक्र थम गया हो। बाहरी जीवनधारा थमने की भले ही प्रतीति न हुई हो, पर सभी के अंतस्थ प्राण अवश्य ठिठक गये थे। देवर्षि नारद के द्वारा कहे गये सूत्र एवं महर्षि देवल की अनुभूति कथा का रस था ही कुछ ऐसा, कि सभी की अंतश्चेतना उसमें भीग गयी थी। सभी की यह अवस्था कितनी देर रही, कहा नहीं जा सकता। चेतना को चैतन्य तब प्राप्त हुआ, जब आकाश सामगान के मंत्रों की अनुगूँज से पूरित होने लगा। दरअसल साम के ये मधुर स्वर पक्षीराज गरुड़ के पंखों से झर रहे थे।
    
विनितानन्दन गरुड़, भगवान के वाहन गरुड़ और सबसे बढ़कर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़, उनकी यह उपस्थिति सभी की चेतना में भक्ति का नया गीत बनकर उतर गयी। वैनतेय ने सभी ऋषियों को नमन किया। देवर्षि तो जैसे उनके प्राणप्रिय सखा ही थे। भगवान नारायण के इन पार्षदों का मिलन अवर्णनीय था। कुछ ऐसा जैसा कि भक्ति की दो धाराएँ मिलकर भावसमाधि की नव सृष्टि कर रही हों। हिमालय के इन हिम-धवल शिखरों ने भी इसे अनुभव किया। पहले ही हो चुके भक्तिमय वातावरण में नवपुलक भर गयी। अब तो बस देवर्षि के मुख से नवसूत्र उच्चारित होना था-
‘अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता॥ १०॥’
अन्य आश्रयों का त्याग ही अनन्यता है।
    
हृदय वीणा की झंकृति की एक समवेत गूँज उठी। इस मधुर झंकृति में भक्ति के अनुभव नवगीत कौन पिरोयेगा? सभी की दृष्टि पक्षीराज गरुड़ की ओर जाकर टिक गयी। सप्तऋषियों ने भी आग्रह किया- ‘‘हे हरिवाहन! आज आप ही इस सूत्र की व्याख्या करें। आप स्वयं प्रभु के श्रेष्ठ भक्त हैं। भक्तों के लिए भगवान की विकलता आपने स्वयं देखी है। भक्तों के हृदय की विह्वलता के भी आप साक्षी रहे हैं। आपके हृदय की अनुभव कथा भी भक्ति में भीगी है।’’ सप्तर्षियों के इस आग्रह पर गरुड़ का गात्र पुलकित हो उठा। उन्होंने विनम्र भाव से कहा- ‘‘हे ऋषिगण! आप सब त्रिलोकी के मार्गदर्शक हैं। भगवान स्वयं आपके हृदय प्रेरक हैं। आपके आदेश को स्वीकारते हुए आज मैं भक्त प्रह्लाद की भक्तिकथा सुनाऊँगा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४८

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २३)

👉 दुखों का कारण

वस्तु स्थिति को न जानने के कारण ही विविध भांति के दुःख संताप उत्पन्न। महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम को दुखों का कारण अज्ञान बताते हुये उससे मुक्त होने का उपाय ज्ञान साधना ही बताया है।
योगवाशिष्ठ का वचन है—
‘‘आयधो व्याधयश्चैव
द्वय दुःखस्य कारणम् ।
तत्क्षयो मोक्ष उच्यते ।।’’
अर्थात्—आधि, व्याधि—अर्थात् मानसिक और शारीरिक यह दो ही प्रकार के दुःख इस संसार में हैं। इनकी निवृत्ति विद्या अर्थात् ज्ञान द्वारा ही होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है।’’

इस प्रकार इस न्याय से विदित होता है कि यदि मनुष्य जीवन से दुःखों का तिरोधान हो जाय तो वह मोक्ष की स्थिति में अवस्थित हो जाये। दुःखों का अत्यन्त अभाव ही आनन्द भी है। अर्थात् मोक्ष और आनन्द एक दूसरे के पर्याय हैं। इस प्रकार यदि जीवन के दुःखों को नष्ट किया जा सके तो आनन्द वाची मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। बहुत बार देखा जाता है कि लोग जीवन में अनेक बार आनन्द प्राप्त करते हैं। वे हंसते, बोलते खाते, खेलते, मनोरंजन करते, नृत्य-संगीत और काव्य-कलाओं का, आनन्द लेते, उत्सव-समारोह और पर्व मनाते, प्रेम पाते और प्रदान करते, गोष्ठी और सत्संगों में मोद-विनोद करते और न जाने इसी प्रकार से आमोद-प्रमोद पाते और प्रसन्न बना करते हैं—तो क्या उनकी इस स्थिति को मोक्ष कहा जा सकता है?

नहीं, मनुष्य की इस स्थिति को मोक्ष नहीं कहा जा सकता। मोक्ष का आनन्द स्थायी, स्थिर, अक्षय, समान अहैतुकं और निःशेष हुआ करता है। वह न कहीं से आता और न कहीं जाता है। न किसी कारण से उत्पन्न होता है और न किसी कारण से नष्ट होता है। वह आत्म-भूत और अहैतुकं होता है। वह सम्पूर्ण रूप में मिलता है सम्पूर्ण रूप में अनुभूत होता है सम्पूर्ण रूप में सदा-सर्वदा ही बना रहता है। वह सार्वदेशिक सर्वव्यापक, और सर्वस्व सहित ही होता है। मोक्ष का आनन्द पाने पर न तो कोई अंश शेष रह जाता है और न उसके आगे किसी प्रकार के आनन्द की इच्छा शेष रह जाती है। वह प्रकाम, पूर्ण और परमावधिक ही होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 25 मई 2021

👉 बेटी

दिव्या विदा होकर चली गई, सुषमा को अभी भी विश्वास नही हो रहा था। दिन भर मानो घर मे रौनक ही दिव्या से ही थी।

कभी लड़ना, कभी बाहें गले मे डाल कर लटक जाना, कभी बाजार साथ, उनकी बेस्ट फ्रेंड थी दिव्या----
पूरा घर सांय सांय कर रहा था। यूं तो घर मे बेटा मोहित, बहू शिल्पा, नन्हा पोता सब थे, पर दिव्या-----

फिर से उनकी आंखें भरने लगी थीं। करवट बदल कर लेटी ही थीं, की एक तेज आवाज सुनाई दी, ओफ्फो मम्मी! कितनी देर सोती रहेंगी? मुझे कॉलेज निकलने में देर हो रही है।

इतनी तेज आवाज!!! शिल्पा तो नही हो सकती। दिव्या!!! वो हड़बड़ा कर उठीं---

संभल कर!, अरे ये क्या उनके सामने शिल्पा थी।

अचानक उनके मुँह से निकला, "कैसे बोल रही हो शिल्पा? क्या बिल्कुल ही भूल गई कि किससे बात कर रही हो? थोड़ा तमीज----"

 पर शिल्पा ने बीच मे ही बात काट कर कहा,
"किससे कर रही हूँ पता है---, मम्मी से---"
क्या एक कप चाय भी मुझे निकलने से पहले खुद ही बनानी होगी?

शिल्पा की आवाज में पहले वाली तेजी बरकरार थी।

अब तक सुषमा बिस्तर छोड़ चुकीं थीं, गुस्से में कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था, कि शिल्पा के चेहरे पर नज़र पड़ी,
होंठों पर मंद स्मित और आंखों में नमी---

सुषमा को अब सब समझ आ चुका था। आगे बढ़कर उन्होंने शिल्पा को गले लगा लिया---
मेरी बेटी---

अब दोनो मां बेटी की आंखें भीग चुकी थीं।

लाती हूँ चाय, पर शाम को सब्जी तू ही बनाएगी कहे देती हूँ।

कह कर सुषमा हल्के मन से किचन की तरफ बढ़ गई।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २२)

👉 अपनी अपनी दुनिया

संसार के स्वरूप निर्धारण में—उन्हें जानने समझने में पांच ज्ञानेन्द्रियों की भांति ही यह मनः संस्थान के चार चेतना केन्द्र भी काम करते हैं। अतएव उन्हें भी अनुभूति उपकरणों में ही गिना गया है। हमारा समस्त ज्ञान इन्हीं उपकरणों के आधार पर टिका हुआ है।

मनुष्यों की भिन्न मनःस्थिति के कारण एक ही तथ्य के सम्बन्ध में परस्पर विरोधी मान्यतायें एवं रुचियां होती हैं। यदि यथार्थता एक ही होती तो सबको एक ही तरह के अनुभव होते। एक व्यक्ति अपराधों में संलग्न होता है दूसरा परमार्थ परोपकार में। एक को भोग प्रिय है दूसरे को त्याग। एक को प्रदर्शन में रुचि है दूसरे को सादगी में। एक विलास के साधन जुटा रहा है दूसरा त्याग पथ पर बढ़ रहा है। इन भिन्नताओं से यही सिद्ध होता है कि वास्तविक सुख-दुख, हानि-लाभ कहां है किसमें है इसका निर्णय किसी सार्वभौम कसौटी पर नहीं मनःसंस्थान की स्थिति के आधार पर दृष्टिकोण के अनुरूप ही किया जाता है। यह सार्वभौम सत्य यदि प्राप्त हो गया होता तो संसार में मत-भेदों की कोई गुंजाइश न रहती। मनःसंस्थान जो अनुभव कराता है उसमें भी इन्द्रिय ज्ञान से कम नहीं वरन् अधिक ही भ्रांति भरी पड़ी है।

सुख और दुख की अनुभूति सापेक्ष है। दूसरे की तुलना करके ही स्थिति के भले-बुरे का अनुभव किया जाता है। कोई मध्य स्थिति का व्यक्ति अमीर की तुलना में गरीब है। किन्तु महादरिद्र की तुलना में वह भी अमीर है। ज्वर पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ मनुष्य की तुलना में दुखी है पर केन्सर ग्रस्त की तुलना में सुखी। शरीर पीड़ा की कुछ अनुभूतियों को छोड़कर शेष 90 प्रतिशत दुख और सुख सापेक्ष होते हैं। उसी स्थिति में एक व्यक्ति अपने को सुखी अनुभव कर सकता है। और दूसरा दुखी। इन विभिन्न निष्कर्षों के आधार पर सत्य को पहचानना कठिन है।

संसार पदार्थों से बना है। पदार्थ अणुओं से बने हैं। अणु परमाणुओं से—परमाणु इलेक्ट्रोन, प्रोटोन आदि विखण्डों से—और वे विखण्ड तरंगों के घनीभूत रूप हैं। विज्ञान बताता है कि यह जगत तरंगों का परिणाम है, तरंग मय है, तरंग ही है। शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की तन्मात्रायें और विचार विवेचना, अभिव्यक्ति, अनुभूति अभिव्यंजना आदि के पीछे केवल तरंगें काम करती हैं। यहां तरंगों के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं है।

प्रकृति में परम सत्ता का निरन्तर संयोग मिलन, संस्फुरण, आदान-प्रदान, आकर्षण-विकर्षण ही तरंगें बनकर गतिशील रहता है और वह गति ही पदार्थ बनकर सामने आती रहती है। जो दीखता है उसके मूल में केवल तरंग स्फुरणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो प्रिय अप्रिय है उसमें आत्मानुभूति की मात्रा की घट-बढ़ की उथल-पुथल के अतिरिक्त और कहीं कुछ भी नहीं है। जड़ चेतन के समस्त परमाणु एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के अनुरूप एक दिशा में चलते जा रहे हैं। उस प्रवाह का कोई चाहे तो समुद्र तट पर बैठकर उसकी हिलोरों का आनन्द ले सकता है। भ्रमग्रस्त हर नई लहर के आने का लाभ और जाने की हानि समझता हुआ हंसने रोने का प्रलाप कर सकता है। नियति का क्रम अपने ढंग से चलेगा, किसी के सोचने का तरीका क्या है, इसकी उसे परवा नहीं। हाथी अपनी राह चलेगा ही कुत्ते उसका स्वागत करें या रोष दिखायें यह उनकी मर्जी। प्रकृति की स्वसंचालित व्याख्या हाथी की तरह ही चलेगी यहां हर वस्तु का रूप बदलेगा। आज का सृजन, संयोग कल विनाश एवं वियोग का रूप धारण करेगा। अपरिवर्तनवादी आकांक्षा अधूरी ही रहेगी। यहां स्थिरता के लिये कोई स्थान नहीं। जो संग्रह एवं स्थायित्व के अभिलाषी हैं उन्हें निराशा भरे पश्चात्ताप के अतिरिक्त और क्या हाथ लगेगा?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २२)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम

देवर्षि के उपदेश के अनुसार मैंने भक्ति प्रारम्भ की, परन्तु मेरे लिए यह करना आसान न था। अन्दर-बाहर अनेकों उपद्रव उठ खड़े हुए। इन्द्रियाँ और मन मुझे बार-बार दुष्प्रवृत्तियों की ओर खींचते थे। पिछले संचित कर्म जो अब प्रारब्ध बन चुके थे। इनके प्रहार दारुण थे। लोकलाँछन, कटुक्तियाँ, व्यंग्य सब कुछ असहनीय था। बाहर शत्रु संहारक हो रहे थे तो देह में रोग संघातक थे। इतनी जटिलताओं में मेरे पास केवल माँ का नाम था। जिस पर मुझे ठीक-ठीक भरोसा नहीं हो रहा था। तभी मेरे पास देवर्षि का दुबारा आगमन हुआ, ये कहने लगे-व्याकुल न हो देवल! बस माँ का नाम मंत्र रटे जाओ। दोषों की न तो चिंता करो और न चिंतन। ये जैसे हैं बने रहने दो। बस माँ के मंत्र में अपनी अनन्यता बढ़ाते जाओ।
    
देवर्षि के वचनों ने मुझे हिम्मत दी। मेरी भक्ति अनन्यता के पथ पर बढ़ चली। ध्यान तो मेरा लगता नहीं था, बस मंत्र रटन थी। इस रटन को मैं प्रगाढ़ करता गया। कुसंस्कारों की कठोर ठोकरें मुझे जितनी चोटें पहुँचातीं, उतनी ही व्याकुलता से मैं माँ को पुकारता। कष्ट जितने बढ़ते मेरी पुकार उतनी ही बढ़ती। धीरे-धीरे मुझमें भरोसा आया कि माँ मेरा, मुझ पाप-पंक में पड़े अपने इस अधम संतान का अवश्य उद्धार करेगी। मैं तो बस बार-बार यही रटता था-

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं,
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः,
क्षुधा तृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥
    
हे माता दुर्गे! करुणासिंधु महेश्वरी! मैं विपत्तियों में फँसकर आज जो तुम्हारा स्मरण करता हूँ, इसे मेरी विनती मानना; भूख-प्यास से पीड़ित बालक माता का ही स्मरण करते हैं।
    
और सच में ही माता ने मेरी पुकार सुन ली। वृत्तियों की चपलता कब शान्त हुई, कब चित्त निरुद्ध हुआ, पता ही नहीं चला। अब तो समस्त भुवनों में वही भुवनेश्वरी झलकती हैं।’’ महर्षि देवल ने अपनी भक्तिकथा समाप्त करते हुए सभी की ओर देखा। सबकी आँखों में आँसू थे, ये प्रेमाश्रु थे। इन भावबिन्दुओं में सभी की भक्ति छलक रही थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४६

रविवार, 23 मई 2021

👉 अहंकार

एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी सन्त के साथ बैठे हुए थे। ठण्ड के दिन थे। सांयकाल हो गया था। तब सन्त ने ठण्ड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां एकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों सन्त धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे।

इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे भी ठण्ड लगी तो उसने भी कुछ लकड़ियां एकट्ठा कर लीं। अब लकड़ी जलाने के लिए उसे आग की आवश्यकता थी। वह तुरन्त ही दोनों संतों के पास पहुंचा और धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया।

एक व्यक्ति ने सन्त द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया तो सन्त गुस्सा हो गए। वे उसे मारने लगे। संत ने कहा कि तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई, तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया।

रामकृष्ण परमहंस ये सब देखकर मुस्कुराने लगे। जब संत ने परमहंसजी को प्रसन्न देखा तो उन्हें और गुस्सा आ गया। उन्होंने परमहंसजी से कहा, ‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं? ये व्यक्ति अपवित्र है, इसने गन्दे हाथों से मेरे द्वारा जलाई गई अग्नि को छू लिया है तो क्या मुझे गुस्सा नहीं होना चाहिए?’

परमहंसजी ने कहा, ‘मुझे नहीं मालूम था कि कोई वस्तु छूने से अपवित्र हो जाती है। अभी आप ही कह रहे थे कि सभी व्यक्तियों में परमात्मा का वास है। और थोड़ी ही देर पश्चात् आप ये बात स्वयं ही भूल गए।’ उन्होंने आगे कहा, ‘वास्तव में इसमें आपकी गलती नहीं है। आपका शत्रु आपके अन्दर ही है, वह है अहंकार।

घमण्ड के कारण ही हमारा सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है, इसीलिए हमें इससे बचना चाहिए। इस बुराई पर विजय पाना बहुत कठिन है।

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 23 May 2021


👉 भक्तिगाथा (भाग २१)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि अपनी किन्हीं स्मृतियों मे खो गये। इन स्मृतियों की मधुरता उनके होठों पर मुस्कान बनकर खेलने लगी। उनके पास बैठे महर्षि देवल देवर्षि का यह भाव परिवर्तन देख रहे थे। उनसे रहा न गया और उन्होंने पूछ ही लिया- ‘‘किसी भक्त के चरित्र का स्मरण हो आया क्या देवर्षि?’’ नारद ने महर्षि देवल की ओर बड़ी स्नेहिल दृष्टि से देखा और बड़े आत्मीय स्वरों में बोले- ‘‘हाँ महर्षि! वह परम भक्त स्वयं आप हैं।’’ देवर्षि के ये वचन सुनकर देवल थोड़ा संकुचित हुए और कहने लगे- ‘‘भगवन्! भला मैं किस तरह का भक्त हूँ। मेरा अतीत तो आप जानते ही हैं। बस माता जगदम्बा के स्मरण ने मुझे आप सब भगवद्भक्तों का सेवक होने का अवसर दिया है।’’
    
‘‘सो तो ठीक है महर्षि देवल, परन्तु मेरा अनुरोध है कि अपनी भक्तिकथा आप स्वयं सुनायें।’’ देवर्षि के इस कथन पर सभी ने हामी भरी। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तो इस प्रस्ताव पर विभोर हो गये और बोले- ‘‘जिसे पराम्बा जगदीश्वरी ने स्वयं अपना पुत्र कहा है, उनकी कथा हम स्वयं सुनेंगे।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन पर महर्षि देवल ने बड़े विनय भरे स्वरों में कहा- ‘‘यह सच है ऋषिगण कि मैं माँ की ममता से कृतार्थ हुआ हूँ, लेकिन इसका कारण मेरा कोई गुण नहीं, बल्कि माता का अपनी संतान के प्रति प्रेम है।
    
मैं तो बचपन से ही कुसंगति के कारण अनेक बुरे कर्मों में लिप्त हो गया। कुसंस्कार अपने अनुरूप कुसंग, कुप्रवृत्ति, कुकर्म एवं कुपरिणाम देते हैं। मेरे साथ भी यही प्रक्रिया चल रही थी। मेरे दुर्गुणों ने ही मुझे दोषों से घेर लिया था। पाप का अँधेरा था, पीड़ा गहरी थी। अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों के कारण देह रोगी हो चली थी और मन संतप्त। किसी दिशा में कोई किरण नहीं नजर आ रही थी। तभी माँ के कृपापुञ्ज बनकर आए देवर्षि ने बड़ी आश्वस्ति से कहा-देवल! माँ की कृपा से सब कुछ सम्भव है। उनकी कृपा से न केवल तुम्हारी पीड़ा का निवारण हो सकता है, बल्कि तुम स्वयं औरों की पीड़ा का निवारण कर सकते हो।
    
इन वचनों के साथ देवर्षि ने मुझे माता सिंहवाहिनी-अष्टभुजा दुर्गा का ध्यान बताया और उनके पावन मंत्र का उपदेश दिया। भगवान विष्णु के परम भक्त नारद के श्रीमुख से दुर्गा का ध्यान एवं मंत्रोपदेश कुछ अचरज सा लगा, परन्तु देवर्षि हँसते हुए बोले-इस अचरज भरे प्रश्न का उत्तर तुम्हें ब्राह्मी अवस्था में पहुँचने पर मिलेगा। विष्णु ही वैष्णवी हैं, दुर्गा ही गायत्री हैं, परन्तु साधना का पथ जन्मांतर के संस्कारों पके अनुरूप निर्धारित होता है। यदि पिछले जन्म के संस्कारों को पहचान कर भक्ति साधना की जाय तो चित्त का निरोध शीघ्र होता है। देवर्षि ने ही बताया कि मुझमें भगवती पराम्बा हिमालय नन्दिनी की भक्ति के संस्कार हैं।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४५

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २१)

👉 अपनी अपनी दुनिया

सच तो यह है कि स्वाद की तरह रंगों की अनुभूति में भी हर मनुष्य का अनुभव एक दूसरे से पूरी तरह नहीं मिलता और उसमें अन्तर होता है। यह अन्तर इतना सूक्ष्म होता है कि उसका वर्णन हमारी शब्दावली ठीक तरह से नहीं कर सकती। एक वस्तु की मिठास एक व्यक्ति को जैसी अनुभव होती है, दूसरे को उसकी अनुभूति जैसी होगी, उसमें अन्तर रहेगा और अन्तर इतना हलका है कि सभी लोग गन्ने को ‘मीठा’ कह सकते हैं पर इस मिठास को किसने किस तरह के स्तर का अनुभव किया इस की कोई सूक्ष्म परीक्षा व्यवस्था हो तो सहज ही यह कहा जा सकता है कि एक ने दूसरे से काफी अन्तर वाली मिठास चखी हैं। इसका कारण मुख में रहने वाली रासायनिक द्रवों की संरचना एवं मात्रा में अन्तर होना होता है।

हमारी आंखें जिस वस्तु का जो रंग देखती हैं क्या वस्तुतः वह उसी रंग की है? हमारी आंखों को जिस वस्तु का जो रंग दीखता है क्या अन्य जीवों को भी वैसा ही दीखता है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर बेखटके नहीं दिया जा सकता है।

तथ्य यह है कि वस्तुतः किसी पदार्थ का कोई रंग नहीं है। अणुओं की विशेष प्रकार की संरचना ही सघन होकर विभिन्न प्रकार की वस्तुओं जैसी बनती है। अणुओं का कोई रंग नहीं। फिर रंगीनी क्या है?

वस्तुएं सूर्य की केवल सफेद किरणों को आत्मसात करती हैं और उन किरणों के किसी एक रंग को प्रतिबिम्बित करती हैं। पौधे की पत्तियां रहे रंग की इसलिए दीखती हैं कि वे सूर्य किरणों का हरा रंग पचा नहीं पातीं और उसकी उलटी कर देती हैं। पत्तियों द्वारा किरणों का हरा रंग वापिस फेंक देना यही है उनका हरा रंग दिखाई पड़ना।

तत्व ज्ञानियों का यह कथन एक दृष्टि से सर्वथा सत्य है कि—‘‘हर मनुष्य की अपनी दुनिया है। वह उसकी अपनी बनाई हुई है और उसी में रमण करता है। दुनिया वस्तुतः कैसी है? इस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है कि वह जड़ परमाणुओं की नीरस और निर्मम हलचल मात्र है। यहां अणुओं की धूल बिखरी पड़ी है और वह किन्हीं प्रवाहों में बहती हुई इधर-उधर भगदड़ करती रहती है। इसके अतिरिक्त यहां ऐसा कुछ नहीं है जिसे स्वादिष्ट अस्वादिष्ट या रूपवान कुरूप कहा जा सके। हमें नीम की पत्ती कड़वी लगती हैं पर ऊंट उन्हें रुचि पूर्वक खाता है संभव है उसे वे पत्तियां बिस्कुट या मिठाई की तरह मधुर लगती हों। वस्तुतः कोई वस्तु न मधुर है न कड़वी हमारी अपनी संरचना ही अमुक वस्तुओं के साथ तालमेल बिठाने पर जैसी कुछ उलटी-पुलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है उसी आधार पर हम उसका रंग स्वाद आदि निर्धारण करते हैं।

यही बात प्रिय अथवा अप्रिय के सम्बन्ध में लागू होती है। अपने और बिराने के सम्बन्ध में भी अपनी ही दृष्टि और अपनी ही मान्यता काम करती है। वस्तुतः न कोई अपना है न बिराना। इस दुनिया के आंगन में अगणित बालक खेलते हैं। इनमें से कभी कोई किसी के साथ हो लेता है, कभी प्रतिपक्षी का खेल खेलता है। इन क्षणिक संयोगों और संवेगों को बालबुद्धि जब बहुत अधिक महत्व देने लगती है तो प्रतीत होता है कि कुछ बहुत बड़ी अनुकूलता-प्रतिकूलता उत्पन्न हो गई है। हर्ष शोक के आवेशों में घटना क्रम उतना उत्तरदायी नहीं होता जितना कि  अपना मनःस्तर स्वयं सोचने का दृष्टिकोण। सन्त और चोर के—ज्ञानी और अज्ञानी के—दृष्टिकोण में एक ही स्थिति के सम्बन्ध में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है उसका कारण प्रथक-प्रथक मनःस्थिति ही है। घना क्रम का उतना श्रेय या दोष नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शुक्रवार, 21 मई 2021

👉 डर पर जीत हासिल करने की सीख देती कहानी

सुमित और रोहित एक छोटे से गाँव में रहते थे। एक बार दोनों ने फैसला किया कि वे गाँव छोड़कर शहर जायेंगे और वही कुछ काम-धंधा खोजेंगे। अगली सुबह वे अपना-अपना सामान बांधकर निकल पड़े। चलते-चलते उनके रास्ते में एक नदी पड़ी, ठण्ड अधिक होने के कारण नदी का पानी जम चुका था। जमी हुई नदी पे चलना आसान नहीं था, पाँव फिसलने पर गहरी चोट लग सकती थी।

इसलिए दोनों इधर-उधर देखने लगे कि शायद नदी पार करने के लिए कहीं कोई पुल हो! पर बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई पुल नज़र नहीं आया। रोहित बोला, “हमारी तो किस्मत ही खराब है, चलो वापस चलते हैं, अब गर्मियों में शहर के लिए निकलेंगे! “नहीं”, सुमित बोला, “नदी पार करने के बाद शहर थोड़ी दूर पर ही है और हम अभी शहर जायेंगे…”और ऐसा कह कर वो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

अरे ये क्या का रहे हो….पागल हो गए हो…तुम गिर जाओगे…”रोहित चिल्लाते हुए बोल ही रहा था कि सुमित पैर फिसलने के कारण गिर पड़ा। “कहा था ना मत जाओ..”, रोहित झल्लाते हुए बोला। सुमित ने कोई जवाब नही दिया और उठ कर फिर आगे बढ़ने लगा एक-दो-तीन-चार….और पांचवे कदम पे वो फिर से गिर पड़ा.. रोहित लगातार उसे मना करता रहा…मत जाओ…आगे मत बढ़ो…गिर जाओगे…चोट लग जायेगी… लेकिन सुमित आगे बढ़ता रहा।

वो शुरू में दो-तीन बार गिरा ज़रूर लेकिन जल्द ही उसने बर्फ पर सावधानी से चलना सीख लिया और देखते-देखते नदी पार कर गया। दूसरी तरफ पहुँच कर सुमित बोला, ” देखा मैंने नदी पर कर ली…और अब तुम्हारी बारी है!” “नहीं, मैं यहाँ पर सुरक्षित हूँ… लेकिन तुमने तो शहर जाने का निश्चय किया था।” “मैं ये नहीं कर सकता! नहीं कर सकते या करना नहीं चाहते!  सुमित ने मन ही मन सोचा और शहर की तरफ आगे बढ़ गया।

शिक्षा:-
दोस्तों, हम सबकी ज़िन्दगी में कभी न कभी ऐसे मोड़ आ ही जाते हैं जब जमी हुई नदी के रूप में कोई बड़ी बाधा या Challenge  हमारे सामने आ जाता है। और ऐसे में हमें कोई निश्चय करना होता है। तब क्या हम खतरा उठाने का निश्चय लेते हैं और तमाम मुश्किलों, डर, और असफलता के भय के बावजूद नदी पार करते हैं? या हम Safe रहने के लिए वही खड़े रह जाते हैं जहाँ हम सालों से खड़े थे?

जहाँ तक दुनिया के सफल लोगों का सवाल है वे रिस्क लेते हैं…अगर आप नहीं लेते तो हो सकता है आज आप बिलकुल सुरक्षित हों आपके शरीर पर एक भी घाव ना हों…लेकिन जब आप अपने भीतर झाकेंगे तो आपको अपने अन्दर ज़रूर कुछ ऐसे ज़ख्म दिख जायेंगे जो आपके द्वारा अपने सपनो को के लिए कोई प्रयास ना करने के कारण आज भी हरे होंगे।

दोस्तों, पंछी सबसे ज्यादा सुरक्षित एक पिंजड़े में होता है…लेकिन क्या वो इसलिए बना है? या फिर वो आकश की ऊँचाइयों को चूमने और आज़ाद घूमने के लिए दुनिया में आया है? फैसला आपका है…आप पिंजड़े का पंछी बनना चाहते हैं या खुले आकाश का?

👉 भक्तिगाथा (भाग २०)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम

प्रतीक्षा के इन पलों में सभी की अंतश्चेतना में भक्ति के नये सूत्र की जिज्ञासा गहरी हुई। देवर्षि इस सच से परिचित थे। उन्होंने वीणा के तारों की झंकृति के साथ मधुर स्वरों में उच्चारित किया-
‘तस्मिन्नन्यता तद्विरोधिबूदासीनता च’॥ ९॥
उस प्रिय परात्पर चेतना में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदसीनता को निरोध कहते हैं।
    
नारद की वाणी इतनी सजल थी कि वह सहज ही सबमें संव्याप्त हो गयी। दो पलों तक समूची व्यापकता में मौन पसरा रहा। एक नीरव निःस्पन्दता सब तरफ छायी रही। अंततः महर्षि मरीचि मुखर हुए। उन्होंने कहा कि ‘‘देवर्षि सभी तपस्वी, साधक एवं सिद्ध इस निरोध अवस्था को पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रकारों ने चित्त के निरोध को योग की संज्ञा दी है। आप बताएँ कि निरोध का स्वरूप क्या है और इसकी साधना की प्रक्रिया क्या है?’’
    
महर्षि मरीचि के ये वचन सभी को अपने से लगे। ब्रह्मर्षि क्रतु तो इस जिज्ञासा पर अति प्रसन्न हो गये और कहने लगे- ‘‘देवर्षि सच तो यही है, चित्त का निरोध ही मानव चेतना का आरोग्य है। इसके विपरीत जो कुछ भी है, उसमें मानव मन रुग्ण एवं संतप्त ही रहता है।’’ अभी तक देवर्षि मौन भाव से महर्षियों के इस कथन को सुन रहे थे। उनकी आँखें हिमालय की सुषमा को निहार रही थीं। श्वेत हिमशिखर और निरभ्र आकाश सभी पर अपनी परम निर्मलता की वृष्टि कर रहे थे। समूची प्रकृति देवात्मा हिमालय के सान्निध्य में निरोध अवस्था में विराज रही थी। समूचे अस्तित्व में आनन्द और चैतन्यता घुल-मिल रहे थे।
    
देवर्षि का दृष्टा अंतःकरण इन अनुभूतियों के साथ एकरस था। उन्होंने मन्दस्मित के साथ देवों और महर्षियों को कहा- ‘‘हे प्रज्ञाजन! भक्ति का यह नया सूत्र पिछले कहे हुए सूत्र का ही विस्तार है। पिछले सूत्र में भक्ति साधना में निरोध और न्यास की बात थी। उन्हीं की समरूपता इस सूत्र के अनन्यता और उदासीनता में है। एक होता है, दूसरा स्वयं ही आ जाता है। प्रथम यदि क्रिया है तो दूसरा परिणाम। निरोध शब्द में निषेध या नकार नहीं है, बल्कि इसमें आत्म विकास की निरन्तरता और उसका चरम है। निरोध चित्त की ऐसी अवस्था है, जिसमें एकाग्रता, शान्ति, विश्रान्ति एवं बोध का परम जागरण है। भक्त जब अपने आराध्य में अनन्य भाव रखता है तो इसकी शुरुआत हो जाती है। ज्यों-ज्यों उसकी अनन्यता प्रगाढ़ एवं परिपक्व होती है, त्यों-त्यों उसका अंतःकरण सभी ्रकार के दोषों से मुक्त होता है। उसे दोषों को छोड़ना नहीं पड़ता, बल्कि ये अपने आप ही छूटते हैं। उसकी भाव चेतना उपराम एवं उदासीन (उत्+आसीन) ऊपर चली जाती है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४४

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २०)

👉 अपनी अपनी दुनिया

दुनिया वैसी है नहीं—जैसी कि हम उसे देखते हैं। सच तो यह है कि संसार के समस्त पदार्थ कुछ विशेष प्रकार के परमाणुओं की भागती-दौड़ती हलचल मात्र है। हमारी आंखों की संरचना और मस्तिष्क का क्रिया-कलाप जिस स्तर का होता है, उसी प्रकार की वस्तुओं की अनुभूति होती है।

हमारी आंखें जैसा कुछ देखती हैं, आवश्यक नहीं दूसरों को भी वैसा ही दीखें। दृष्टि के मन्द, तीव्र, रुग्ण, निरोग होने की दशा में दृश्य बदल जाते हैं। एक को सामने का दृश्य एक प्रकार का दीखता है तो दूसरे को दूसरी तरह का। यही बात स्वाद के सम्बन्ध में है। रोगी के मुंह का जायका खराब होने के कारण हर वस्तु कड़वी लगती है। पेट भरा होने या अपच रहने पर स्वादिष्ट वस्तु का भी स्वाद बिगड़ जाता है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, हर मनुष्य के स्रावों में कुछ न कुछ रासायनिक अन्तर रहता है जिसके कारण एक ही खाद्य पदार्थ का स्वाद हर व्यक्ति को दूसरे की अपेक्षा कुछ न कुछ भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यों नमक, शकर आदि का स्वाद मोटे रूप से खारी या मीठा कहा जा सकता है पर यदि गम्भीर निरीक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि इस खारीपन और मिठास के इतने भेद प्रभेद हैं जितने कि मनुष्य। किसी का स्वाद किसी से पूर्णतया नहीं मिलता, कुछ न कुछ भिन्नता रहती है। यही बात आंखों के संबन्ध में है आंखों की संरचना और मस्तिष्क की बनावट में जो अन्तर पाया जाता है उसी के कारण एक मनुष्य दूसरे की तुलना में कुछ न कुछ भिन्नता के साथ ही वस्तुओं तथा घटनाओं को देखता है।

मनुष्यों और पक्षियों की आंखों की सूक्ष्म बनावट को देखता है। मस्तिष्कीय संरचना में काफी अन्दर है इसलिए वे वस्तुओं को उसी तरह नहीं देखते जैसे कि हम देखते हैं। उन्हें हमारी अपेक्षा भिन्न तरह के रंग दिखाई पड़ते हैं।

रूस की पशु प्रयोगशाला ने बताया है कि बैल को लाल रंग नहीं दीखता, उनके लिए सफेद और लाल रंग एक ही स्तर के होते हैं। इसी तरह मधु-मक्खियों को भी लाल और सफेद रंग का अन्तर विदित नहीं होता। जुगनू सरीखे कीट पतंग एक अतिरिक्त रंग ‘अल्ट्रावायलेट’ भी देखते हैं जो मनुष्यों की आंखें देख सकने में असमर्थ हैं। पक्षियों को लाल, नीला, पीला, और हरा यह चार रंग ही दीखते हैं। हमारी तरह वे न तो सात रंग देखते हैं और न उनके भेद उपभेदों से ही परिचित होते हैं।

ठीक इसी प्रकार हरी घास की हरीतिमा सबको एक ही स्तर की दिखाई नहीं पड़ेगी। किन्तु हमारी भाषा का अभी इतना विस्तार नहीं हुआ कि इस माध्यम से हर व्यक्ति को जैसा सूक्ष्म अन्तर उस हरे रंग के बीच दिखाई पड़ता है उसका विवरण बताया जा सके। यदि अन्तर प्रत्यन्तर की गहराई में जाया जाय तो स्वाद और रंग के अन्तर बढ़ते ही चले जायेंगे और अन्ततः यह मानना पड़ेगा कि जिस तरह हर मनुष्य की आवाज, शकल और प्रकृति में अन्तर होता है उसी प्रकार रंगों की अनुभूति में भी अन्तर रहता है। स्वाद के सम्बन्ध में भी यही बात है। गन्ध में भी यही अन्तर रहेगा। सुनने और छूने में भी हर व्यक्ति को दूसरे से भिन्न प्रकार का अनुभव होता है। यह भिन्नता बहुत ही सूक्ष्म स्तर की होती है, पर होती अवश्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...