मंगलवार, 25 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २२)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम

देवर्षि के उपदेश के अनुसार मैंने भक्ति प्रारम्भ की, परन्तु मेरे लिए यह करना आसान न था। अन्दर-बाहर अनेकों उपद्रव उठ खड़े हुए। इन्द्रियाँ और मन मुझे बार-बार दुष्प्रवृत्तियों की ओर खींचते थे। पिछले संचित कर्म जो अब प्रारब्ध बन चुके थे। इनके प्रहार दारुण थे। लोकलाँछन, कटुक्तियाँ, व्यंग्य सब कुछ असहनीय था। बाहर शत्रु संहारक हो रहे थे तो देह में रोग संघातक थे। इतनी जटिलताओं में मेरे पास केवल माँ का नाम था। जिस पर मुझे ठीक-ठीक भरोसा नहीं हो रहा था। तभी मेरे पास देवर्षि का दुबारा आगमन हुआ, ये कहने लगे-व्याकुल न हो देवल! बस माँ का नाम मंत्र रटे जाओ। दोषों की न तो चिंता करो और न चिंतन। ये जैसे हैं बने रहने दो। बस माँ के मंत्र में अपनी अनन्यता बढ़ाते जाओ।
    
देवर्षि के वचनों ने मुझे हिम्मत दी। मेरी भक्ति अनन्यता के पथ पर बढ़ चली। ध्यान तो मेरा लगता नहीं था, बस मंत्र रटन थी। इस रटन को मैं प्रगाढ़ करता गया। कुसंस्कारों की कठोर ठोकरें मुझे जितनी चोटें पहुँचातीं, उतनी ही व्याकुलता से मैं माँ को पुकारता। कष्ट जितने बढ़ते मेरी पुकार उतनी ही बढ़ती। धीरे-धीरे मुझमें भरोसा आया कि माँ मेरा, मुझ पाप-पंक में पड़े अपने इस अधम संतान का अवश्य उद्धार करेगी। मैं तो बस बार-बार यही रटता था-

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं,
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः,
क्षुधा तृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥
    
हे माता दुर्गे! करुणासिंधु महेश्वरी! मैं विपत्तियों में फँसकर आज जो तुम्हारा स्मरण करता हूँ, इसे मेरी विनती मानना; भूख-प्यास से पीड़ित बालक माता का ही स्मरण करते हैं।
    
और सच में ही माता ने मेरी पुकार सुन ली। वृत्तियों की चपलता कब शान्त हुई, कब चित्त निरुद्ध हुआ, पता ही नहीं चला। अब तो समस्त भुवनों में वही भुवनेश्वरी झलकती हैं।’’ महर्षि देवल ने अपनी भक्तिकथा समाप्त करते हुए सभी की ओर देखा। सबकी आँखों में आँसू थे, ये प्रेमाश्रु थे। इन भावबिन्दुओं में सभी की भक्ति छलक रही थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४६

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